मेरी खबरों पर एक नजर

Tuesday, December 22, 2009

जयपुर में हम बना रहे हैं दो विश्व रिकॉर्ड, आप भी साक्षी बनें


राजस्थान के इतिहास में यह पहला मौका है, जब गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स के लिए दो विश्व रिकॉर्ड एक साथ बनाए जा रहे हैं। इन दोनों ही विश्व रिकॉर्ड के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड से स्वीकृत मिल चुकी है।

रिकॉर्ड :-

1. विश्व का सबसे बड़ा 'लार्जेस्ट वॉल कैलेंडर' जिसका आकार 120 फीट गुणा 40 फीट है।
बनाने वाली टीम : मनमोहन अग्रवाल व अनुज कुच्छल।

2. विश्व की सबसे बड़ी सुई 'लार्जेस्ट स्विंग नीडल'। सुई का आकार 8.1 फीट।
बनाने वाली टीम : निशांत चौधरी, राजबाला, आलोक शर्मा, प्रवीण जाखड़।

यह दोनों विश्व रिकॉर्ड 26 दिसंबर, 2009 को सुबह 11.15 मिनट पर ट्राईटोन मॉल, झोटवाड़ा पुलिया, जयपुर में सार्वजनिक प्रदर्शन के साथ बनाए जाएंगे।

इन दोनों रिकॉड्र्स के बारे में 21 दिसंबर, 2009 को प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, याहू डॉट कॉम और चेन्नई ऑनलाइन डॉट कॉम की ओर से जारी खबर पढऩे के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें -



Thursday, December 17, 2009

...ये कौन 'पत्रकार' है!



इस कैरीकेचर को बनाने वाले चंद्रप्रकाश शर्मा (कार्टूनिस्ट) से मेरी मुलाकात लगभग पांच साल पहले हुई। उस दौरान राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट से डिग्री कर रहे चंद्रप्रकाश अक्सर पत्रिका के परिशिष्टों के लिए कार्टून, कैरिकेचर और चित्रकथाएं बनाने के फ्रीलांस प्रयास किया करते थे। मेरे कई घपले उजाकर करने वाली खबरों पर अक्सर चंद्रप्रकाश की प्रतिक्रियाएं मुझे मिलती रहीं। कोर्स पूरा हुआ और चंद्रप्रकाश भाग्य आजमाने मुंबई चले गए। आजकल मुंबई की एक एनिमेशन कंपनी में काम कर रहे चंद्रप्रकाश ने हाल ही मेरा कैरीकेचर बनाकर मुझे मेल किया।


चंद्रप्रकाश की इस कृति को मैं हमेशा सहेज कर रखना चाहूँगा।

Thursday, December 3, 2009

मीडिया को जरूरत आलोक शर्मा जैसे पत्रकारों की ! इन्हें बधाई दे सकते हैं...


अपने काम को जुनून ही हद तक जीने की जिद देखनी हो, तो ईटीवी (राजस्थान) के जयपुर संवाददाता आलोक शर्मा से एक मुलाकात करें। बिना पूर्वाग्रहों के ग्लैमर के मोह से दूर कैमरे का ऐसा युवा पत्रकार जो पत्रकारिता को जीना जानता है। जिस पर अपने प्रोफेशन में बेहतर से बेहतर आउटपुट का जुनून हमेशा देखने को मिलता है। ...वह भी पूरी सादगी के साथ।


सही मायने में देखा जाए, तो आज का दिन आलोक का दिन था। जयपुर में ही सिंबॉयसिस इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया एंड कम्यूनिकेशन के एक सम्मान समारोह में युवा पत्रकार आलोक शर्मा को 'यंग कम्यूनिकेटर अवॉर्ड' और 'एक्सीलेंस इन जर्नलिजम अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया। राजस्थान पत्रिका से अपने करियर की शुरुआत करने वाले आलोक ने 2005 में ईटीवी ज्वॉइन किया। अपनी नौकरी लगने के साथ ही आलोक ईटीवी नेटवर्क में सबसे कम उम्र के ब्यूरो इंचार्ज (बीकानेर ब्यूरो) बने। ...और बीकानेर में बेहरीन परफोर्मेंस के चलते उन्हें जयपुर बुला लिया गया। 2008 से आलोक अब जयपुर प्रशासन से जुड़े मामलों सहित कई दूसरी बीट भी देखते हैं। आलोक को ई-टीवी नेटवर्क के तीन बैस्ट स्टोरी अवॉर्ड मिल चुके हैं।

महिला अधिकार, बाल अधिकार और संवेदनशील सामाजिक मुद्दों की खासी समझ रखने वाले आलोक जैसे पत्रकारों की मीडिया को वाकई जरूरत है। क्योंकि जिस समझ, ज्ञान, कार्यक्षमता और अंदाज के साथ युवा पत्रकारिता में आ रहे हैं, उसके बीच इस पीढ़ी के पत्रकारों में आलोक जैसे मेहनती पत्रकार प्रथम पंक्ति में आते हैं।

आप भी आलोक को बधाई दे सकते हैं। आलोक का मोबाइल नंबर - 09314889434

Saturday, November 21, 2009

लॉटरी 40 करोड़ की, मिले 7 रुपए 20 पैसे !


जयपुर की एक जानी-मानी फार्मा कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर अरविंद सैनी को इंटरनेट के जरिए जालसाजी में फंसाया गया। अरविंद सैनी को 40 करोड़ की लौटरी लगने के ई-मेल आए और फिर मिला 7 रुपए, 20 पैसे का चैक। आप अरविंद की जुबानी ही जानें, आखिर हुआ क्या था - 'मुझे ई-मेल से 10 मिलियन डॉलर (40 करोड़ रुपए) की लॉटरी अपने नाम लगने की बात कही गई। जब लॉटरी का चैक मंगवाने के लिए मैंने अपना पता संबंधित कंपनी को भेजा, तो न्यूयॉर्क से मुझे उन्होंने मात्र 18 सेंट (7 रुपए 20 पैसे) का चैक भेज दिया। साथ ही कंपनी ने मुझे शेष रकम लेने के लिए 300 डॉलर (12 हजार रुपए) देने की बात भी कही। जब उन्होंने 10 मिलियन डॉलर की लॉटरी के बदले ही 7.20 पैसे भेजे, तो मुझसे 12 हजार लेने के बाद क्या भेजते? मैंने दोस्तों से बात की, तो उन्हें भी इस तरह के प्रस्ताव मिल चुके थे, लेकिन पैसा कभी नहीं मिला था।'

ऐसे ही मामलों पर कार्रवाई में जुटे दिल्ली पुलिस के साइबर क्राइम चीफ एसीपी एस.डी.मिश्रा से मेरी बातचीत हुई। मिश्रा का कहना था, 'लोटो लॉटरी स्कैम, 419, एडवांस फी रैकेट और ब्लैक डॉलर्स इन दिनों चल रहे जबरदस्त घोटाले हैं। इस तरह की धोखाधड़ी वाले ई-मेल में किए गए वादे गलत होते हैं। ये ई-मेल भेजने वाले खतरनाक अपराधी होते हैं। इस धन का उपयोग गैर-कानूनी गतिविधियों में किया जा रहा है। ऐसे मामलों में तुरंत स्थानीय पुलिस को शिकायत करनी चाहिए।'

...हो सकता है ऐसे जालसाजी से भरेपूरे ई-मेल आपको आते हों, तो कभी भी अपनी निजी जानकारियां, बैंक खातों की जानकारियां, फोन नंबर इन्हें नहीं दें। मैंने इस सारे मामले की पड़ताल करने के लिए कई जालसाजों को अपनी जानकारियां अपनी रिस्क पर सौंपी, लेकिन आप ऐसा नहीं करें।

फिर मिलेंगे, किसी नई खोज के साथ...शुक्रिया

Friday, November 20, 2009

विश्व का सबसे नन्हा ब्लॉगर ! इन्हें जरूर बधाई दें...


बेमिसाल परवरिश का नायाब उदाहरण देखिए। दुनिया की सबसे कम्र उम्र की ब्लॉगर से आपको रूबरू करवाते हुए मैं बेहद खुश हूँ

मुझे अभी-अभी पता चला है। इस दुनिया में कदम रखने वाले अनाम नन्हे ब्लॉगर को सलाम कहने का इससे बेहतरीन अवसर मुझे शायद कभी नसीब हो। चुरू के संजीदा ब्लॉगर श्री दुलाराम सहारण और कृष्णा जी के घर 16 नवंबर को बेटी ने जन्म लिया है। इसी दिन यानी 16 नवंबर को ही दुलाराम जी ने अपनी प्यारी सी बेटी का ब्लॉग (हमारी बेटी का जीवन) बनाया और उसकी प्यारी तस्वीरें ब्लॉग पर दी हैं। विश्व के इस सबसे कम उम्र (यानी 1 दिन) के ब्लॉगर को आप बधाई जरूर दें। क्योंकि जब दुलाराम जी की बेटी बड़ी होगी, ब्लॉगिंग समझने लगेगी, उसे बेहद खुशी होगी, कि आप उसे ब्लॉग के जरिए सबसे पहले बधाई देने वालों में से हैं।


(विशेष : मेरी पहले से शेड्यूल्ड पोस्ट (लॉटरी 40 करोड़ की, मिले 7 रुपए 20 पैसे) इस नन्हें ब्लॉगर को शुभकामना देने के चलते मैंने 24 घंटे बाद के समय पर फिक्स की है, उसे आप देरी से पढ़ पाएंगे, जिसके लिए माफी चाहूँगा। फिलहाल नन्हें कदमों को बधाई दें)

Thursday, November 19, 2009

घोटालों का राज !


ब्लैक डॉलर घोटाला

इसे अंजाम देने वाले किसी बैंक के वास्तविक लगने वाले जाली दस्तावेजों के जरिए लेनदेन का अंतरराष्ट्रीय प्रयास करते हैं। यह दस्तावेज इतनी सफाई से तैयार किए जाते हैं कि बैंक से जुड़े लोग भी असली-नकली का फर्क पहचान नहीं पाते। इन दस्तावेजों के आधार पर खाताधारक से पूरी जानकारी जुटा ली जाती है और उसके खाते से हैकिंग के जरिए पैसा गायब कर दिया जाता है, जिसका इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए होने वाली फंडिंग में किया जाता है। व्यापारिक लेनदेन के नाम पर बनने वाले जाली एग्रीमेंट भी इसी घोटाले के तहत आते हैं।

लोटो लॉटरी घोटाला
बिना लॉटरी का टिकट खरीदे ही 1 से 10 लाख मिलियन डॉलर या इससे अधिक का जैकपॉट खुलने का झांसा ई-मेल के जरिए दिया जाता है। बदले में पूरा नाम, घर का पता, बैंक खाते का नंबर, क्रेडिट कार्ड का नंबर और पासपोर्ट की जानकारी मांग ली जाती है। किसी भी व्यक्ति की गोपनीय जानकारियों को जुटाकर उसके बैंक खाते को हैक किया जाता है और उसकी रकम एक स्थानीय या अंतरराष्ट्रीय फर्जी बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी जाती है। जहां से उसे अगले 24 घंटे में गायब कर दिया जाता है।

419 घोटाला
यह नाइजीरियन क्रिमिनल कोड है। नाइजीरिया से जुड़े अपराधी इसे विश्वभर में भेजते हैं और लुभावने अवसर का झांसा देते हैं। इसमें नौकरी, यात्रा और बड़े धन का झांसा दिया जाता है। इंटरनेट के जरिए इसे चलाने वाले विश्वभर में सर्वाधिक नाइजीरिया के लागोस में हैं। इस घोटाले को अंजाम देने पर जालसाजी से मिलने वाले धन का इस्तेमाल मादक पदार्थों (हेरोइन, कोकीन व हशिश शामिल) की युरोप, दक्षिण अफ्रीका, पूर्वी एशिया और उत्तरी अमरीका में तस्करी, आतंकवादियों के लिए सहायतार्थ फंडिंग और मुद्रा के गैर-कानूनी लेनदेन के लिए किया जाता है। मादक पदार्थों की तस्करी और धन के गैर-कानूनी लेनदेन में भारत तस्करी और दलाल अहम भूमिका निभाते हैं। यह जाल नाइजीरिया, बेनिन, पश्चिम अफ्रीका स्थित कोटे डी लेवोर, टोगो, एम्सटर्डम, फिलीपींस, स्विटजरलैंड, लंदन में बड़े पैमाने पर फैला है।

(कल - 'लॉटरी 40 करोड़ की, मिले 7 रुपए 20 पैसे' में जरूर मिलें उस व्यक्ति से जिसे फर्जी ई-मेल ही नहीं फर्जी चेक भी मिला।)

Wednesday, November 18, 2009

बड़े नाम पर जालसाजी !


इस सारे मामलो की छानबीन के दौरान मुझे 104 ऐसे दस्तावेज मिले, जिनमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए फ्रॉड का खुलासा हो रहा था। इनमें से ज्यादातर दस्तावेज विश्व की बड़ी संस्थाओं के दस्तावेजों की हुबहू नकल थे। इन संस्थाओं में संयुक्त राष्ट्र संघ, बैंक ऑफ अमेरिका, सिटी बैंक व बैंक की सिटी ट्रस्ट सिक्योरिटीज एण्ड फाइनेंस कं.लि., एबीएन एमरो बैंक, अफ्रीकन डेवल्पमेंट बैंक, एपेक्स बैंक, डिप्लोमेटिक कोरियर सर्विस, यूरो ट्रस्ट सिक्योरिटी, फोर्टिस बैंक, राष्ट्रीय मुद्रा विनियम कार्यालय, संयुक्त राष्ट्र संघ का एंटी टैरेरिस्ट डिपार्टमेंट, ब्रिटेन की मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस एण्ड फेयर टे्रडिंग और हांगकांग की एशिया कॉमर्शियल होल्डिंग्स इंटरनेशनल लि. जैसी संस्थाएं शामिल थी। ई-मेल के जरिए इन बड़े नामों का इस्तेमाल करने वालों ने अधिकतर मामलों में वित्तीय संस्थाओं की आड़ में पूरा खेल रचा था।


(देश की खूफिया एजेंसियों, साइबर क्राइम विशेषज्ञों और पुलिस की नाक में दम करने वाले तीन घोटालों की सच्चाई कल की कड़ी ('घोटालों का राज !') में जरूर पढ़ें।)

Tuesday, November 17, 2009

इस जाल में माल कहां !


देश की आंतरिक सुरक्षा में तकनीक के जरिए सेंध लगाकर विदेशी शातिर धोखाधड़ी को अंजाम देने में जुटे हैं। यह धोखाधड़ी इतने बड़े पैमाने पर हो रही है कि देश के साइबर क्राइम विशेषज्ञ और तकनीकी जानकारों के होश उड़े हुए हैं। नाइजीरिया, ऑस्ट्रेलिया, बेनिन और ब्रिटेन सहित एक दर्जन से ज्यादा देशों से प्रसारित फर्जी और लुभावने ई-मेल इस धोखाधड़ी का अहम साधन बन रहे हैं।


ई-मेल के जरिए तीन बड़े घोटालों (ब्लैक डॉलर घोटाला, लोटो लॉटरी घोटाला, 419 घोटाला) को अंजाम दिया जा रहा है। इन घोटालों में लिप्त जालसाजों व दिल्ली पुलिस के अलग-अलग अधिकारियों और ऐसे मामलों पर जांच में जुटी एजेंसियों से तथ्य जुटाए। इसी पड़ताल में मेरा संपर्क उन लोगों से बना, जो इस तंत्र को सुगठित गैंग के जरिए चला रहे हैं। दिल्ली पुलिस के सूत्रों के मुताबिक जयपुर, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों से अफ्रीकन देशों से आए जालसाज सारा खेल कर रहे हैं। इस जालसाजी से कमाए धन का उपयोग आपराधिक गतिविधियों के इस्तेमाल में हो रहा है। जिनमें फर्जी पासपोर्ट बनवाना, ड्रग कारोबार में पैसे का इस्तेमाल और हुंडी जैसे गैर कानूनी तरीकों से पैसे को जुटाना शामिल हैं।


डेढ़ अरब का प्रस्ताव


ई-मेल के जरिए धोखाधड़ी की तफ्दीश करते समय मैंने दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच से जानकारी जुटाने के बाद इंटरनेट के जरिए कुछ संपर्क साधे। मुझे जो लुभावने ई-मेल आए थे, मैंने उन पर संपर्क किया। इस प्रक्रिया के दौरान बेनिन के सेंट्रल बैंक गवर्नर कार्यालय के कथित विदेश विभाग के नाम से मुझे ई-मेल के जरिए संपर्क किया गया। संपर्क डॉ. डेविड उकपडी ने किया जिन्होंने खुद को सेंट्रल बैंक का सचिव बताया।ई-मेल में डॉ. डेविड ने साफ तौर पर कहा कि, 'बेनिन सरकार के आदेश हैं कि 3 करोड़, 88 लाख अमरीकी डॉलर यानी लगभग एक अरब, 55 करोड, 20 लाख रुपए तत्काल आपके खाते में डलवा दिए जाएं। इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (आईएमएफ) के जरिए कुछ समस्या होने के कारण हम यह पैसा आपको टेलीग्राफिक ट्रांस्फर या स्विफ्ट ट्रांस्फर के जरिए ही भेज पाएंगे। इसके लिए बैंक की सभी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं और आपका पैसा एक डोमेंट खाते में अगले दावे तक के लिए रख दिया गया है। आप हमें अपना फोन नंबर और घर का पता तुरंत भिजवाएं ताकि आप अपना पैसा यूरो के्रडिट यूनियन के जरिए तुरंत ले सकें।'


6 करोड़ की सौदेबाजी, 22 करोड़ का सौदा


एक और मामले में कथित जिम्बाव्वे निवासी मार्क काबारेट ने खुद को 45 वर्षीय शिपिंग व्यापारी (न्योनी शिपिंग लाइंस से संबंधित) बताकर मुझसे लगभग 6 करोड़ रुपए की मांग की। मार्क के मुताबिक वह अर्से से ब्रिटेन में हैं और अपना शिपिंग व्यापार हाल ही ब्रिटिश सरकार के कारण छोड़ चुके हैं। मार्क ने कहा, 'आपके द्वारा भेजा गया 6 करोड़ रुपया मैं एक सिक्योरिटी फर्म के जरिए वापस भारत लाऊंगा, जहां हम मिलकर व्यापार करेंगे। इसके बदले 20 प्रतिशत एक मुश्त और तीन वर्ष बाद पूरी रकम 5 प्रतिशत ब्याज के साथ वापस लौटाऊंगा।' मार्क ने प्रस्ताव के जवाब के साथ निजी फोन नंबर व पते की मांग भी की। इसके बदले मैंने मार्क को व्यापार के लिए 6 की बजाय लगभग 4 करोड़ रुपए देने की बात कही। सौदे की इस वार्ता की एवज में मार्क ने मुझे ई-मेल पर 5.5 मिलियन अमरीकी डॉलर यानी लगभग 22 करोड़ रुपए का 3 पन्नों वाला एग्रीमेंट अपने वकील ऐलन कॉली से तैयार करवाकर भिजवा दिया। इस एग्रीमेंट के मुताबिक मुझे 22 करोड़ रुपए मार्क को देना व इसे खर्च करने के अधिकार मार्क को देने की बात कही गई थी, जिस पर मुझसे महज हस्ताक्षर की मांग की गई थी। इस संबंध में मैंने नाइजीरिया पुलिस की ऐसे घोटालों पर काम कर रही विशेष टीम से संपर्क भी साधा, लेकिन दो महीने से भी ज्यादा समय निकल जाने के बावजूद नाइजीरिया पुलिस की इन घोटालों पर काम कर रही स्पेशल टीम ने कोई जवाब नहीं दिया।


फर्जी पता, फर्जी व्यापारी


खुद को ब्रिटिश व्यापारी बताने वाले मार्क और उसके वकील एलन कॉली की वास्तविकता का पता लगाने के लिए मैंने इंग्लैंड संपर्क साधा। मार्क और उसके वकील द्वारा दिए पते पर एग्रीमेंट मिलने के अगले ही दिन संपर्क भी किया गया, जिसमें पता चला कि न तो इस नाम से कोई व्यक्ति यहां है और न ही मार्क के वकील की कंपनी अस्तित्व में है। एग्रीमेंट में लिखे पते का जो प्लॉट का नंबर मार्क ने 383 बताया उस जगह इस नंबर का प्लॉट था ही नहीं।


(अगली कड़ी में आप कल जानेंगे दुनिया की कौन-कौन सी बड़ी कंपनियों, बड़े नामों के हुबहू फर्जी दस्तावेजों को जरिया बनाकर हो रही है जालसाजी - पढऩा ना भूलें 'बड़े नाम पर जालसाजी')

Friday, November 13, 2009

फर्जीवाड़े की मिसाल देखिए...


ऐसे ही फर्जीवाड़े से आप जरूर रूबरू हुए होंगे। 5-50 लाख डॉलर की लॉटरी का कोई ई-मेल आपके पास भी आया होगा। मुझे भी आया। करोड़ों के सौदे का एक प्रस्ताव मैंने ऐसे ही जालसाज से अपने नाम पर मंगवा भी लिया। ...लेकिन अब तो हद हो गई। मेरे एक मित्र को इसी महीने की 3 तारीख को जालसाजी से भरापूरा ई-मेल 'हिंदी' में मिला है।

इस तस्वीर को देखकर फर्जीवाड़े की हद का अंदाजा आप भी लगा सकते हैं। पहले जहां ऐसे ई-मेल अंग्रेजी भाषा के उपयोग के साथ मेल बॉक्स में आया करते थे, अब हिंदी में आने लगे हैं।

ऐसे ही एक मामले को खंगालता-खंगालता जब मैं काफी आगे निकल गया, तो मुझे पिछले दिनों कई गोपनीय बातों का पता चला। पुलिस विभाग के चंद सूत्रों और डीआईजी से मेरी मुलाकातों में सामने आया कि ऐसे फर्जीवाड़ों में लोकल दलाल बड़ी भूमिका निभाते हैं। कैसे चलता है सारा खेल आप जल्द ही (17 नवंबर को) यहां पढ़ सकते हैं। बस ऐसे जालसाजों से सावधान रहिए और अगली कड़ी का इंतजार कीजिए। कुछ पुख्ता सबूतों के साथ अगली मुलाकात होगी....

Thursday, October 29, 2009

तूफानों की कमी नहीं जीवन में...


बिना पैरों वाले फोटोग्राफर केविन कोनोली ने खींची विश्वभर में घूम-घूम कर 32 हजार से ज्यादा तस्वीरें। ...आप भी जाने इस तूफानों से भरे जीवन को केविन की ही जुबानी।

मैं 22 साल का हूँ। मेरे दोनों पांव नहीं हैं। बस दो हाथ ही मेरी जिंदगी का सहारा हैं। इन्हीं हाथों के सहारे स्केट बोर्ड पर मुझे अपना सारा सफर तय करना होता है। मैं दो बार पूरी दुनिया घूम चुका हूँ। सफर पूरा होने से पहले मैं अगले सफर की प्लानिंग शुरू कर देता हूँ। मैं व्यावसायिक फोटोग्राफर हूँ और अब तक विश्व भर से 32,728 से ज्यादा तस्वीरें खींच चुका हूँ।


अमरीका के हैलिना में मैंने जन्म लिया था। मेरे पैदा होते ही मां और पिताजी को डॉक्टर का जवाब मिला, 'इसे स्पॉरेडिक बर्थ डिफेक्ट' है। बचपन से ही दोनों पांव नहीं हैं। अपने निचले धड़ को घसीट कर चलना और दोनों हाथों को अपने चलने का साधन बना लेने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। सात साल की उम्र में घरवालों ने मुझे चमड़े की पैंट तैयार करवा कर दी। अक्सर जमीन की रगड़ से शरीर छिल जाता था। इसी रगड़ से मैं बचा रहूँ, मैंने इस पैंट को पहना जो आज तक मेरे साथ है। यह चमड़े और रबर से बनी है, ताकि मुझे चलने में असुविधा न रहे। मुझे हर रोज मां व्हील चेयर पर बिठाकर स्कूल छोडऩे जाती और वापस लाती। इसी समय अपने शरीर का संतुलन बनाना सीखने के लिए मैंने जिम्नास्टिक की क्लास में जाना शुरू कर दिया था। जब मैं 18 साल का हुआ, तो मुझे स्केट बोर्ड दिलाया गया। ...और जैसे मेरे शरीर के पंख ही लग गए। कॉलेज में क्लास लेने के बाद मैं अपना ज्यादा से ज्यादा समय स्केट बोर्ड पर कॉलेज कैंपस में इधर-उधर घूमने में बिताता था। हमेशा महसूस करता कि मैं साधारण व्यक्ति से भी तेज दौडऩे में सक्षम हूँ।


मुझे कभी नहीं लगा कि हार मानने का वक्त आ गया है। मैंने स्केट बोर्ड इतना अच्छे तरीके से सीखा कि एक्स गेम्स में मुझे स्केटिंग के लिए सिल्वर मैडल मिला। जब मैंने एक्स गेम्स में सिल्वर मैडल जीता, तो मुझे इनाम के तौर पर 11 सप्ताह यूरोप और एशिया घूमने का मौका दिया गया। मेरी फोटोग्राफी को 'द रॉलिंग एग्जीबिशन' नाम से प्रस्तुत करना चाहते थे। अपने बड़े कलेक्शन को मैंने निकोन के उस कैमरे से तैयार किया है, जो अक्सर मेरी पीठ पर ही टंगा रहता है। मैंने मजदूरों, बच्चों, भिखारियों, फसलों पर अपनी फोटोग्राफी को केंद्रित रखा है। फोटोग्राफी की शुरुआत मैंने वियना से की थी और मेरी पहली ही फोटोग्राफी सिरीज को जमकर सराहना मिली। मुझे याद है, जब मैं मोंटाना स्टेट यूनिवर्सिटी में फोटोग्राफी की पढ़ाई करने गया, तो अपनी पहली क्लास में एक रील भी पूरी नहीं कर पाया था। यहीं पर मैंने फिल्म संबंधी क्लास भी ली थी, जिसमें मैंने असल फोटोग्राफी के मायने सीखे। मेरी फोटोग्राफी को हर जगह सराहना मिली। इसी वजह से मुझे मोंटाना स्टेट यूनिवर्सिटी की ओर से फोटोग्राफी ग्रांट (फोटोग्राफी सीखने के लिए सहायता) दी गई, जिसके तहत मैं फोटोग्राफी करने के लिए स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड और फिर आइसलैंड गया। मैं पढ़ाई के लिए न्यूजीलैंड भी गया और अपनी डिग्री वहीं से पूरी की।


मैं थिएटर आर्टिस्ट भी हूँ और अखबारों के लिए लिखना मेरा शौक है। अब तक स्केट बोर्ड से खेली जाने वाली कई स्थानीय प्रतियोगिताओं में मैं भाग ले चुका हूँ। मैं हमेशा यही जानना चाहता था कि यह दुनिया कितनी कलात्मक है? जब सफर पर निकला, तो आज तक रुक ही नहीं पाया। सब मुझे देखते ही हैरत करते हैं और मेरे दोनों पांव नहीं होने की वजह तलाशने की कोशिश करते हैं। मैंने 15 देशों के 31 शहरों से जब तस्वीरें खींची, जिन्हें देख हर किसी ने सराहा। मैं खुश हूँ, मैंने जितना पाया, उतने की उम्मीद कभी नहीं की थी। अपने दोनों पांव न होने का जरा सा भी मलाल मुझे नहीं है। दुनिया घूमी है इसलिए महसूस करता हूँ कि मेरी जिंदगी खुद एक तस्वीर की तरह है, इसमे जितनी खुशी के भाव होंगे, उतनी ही खूबसूरत तस्वीर बनेगी।

Saturday, October 17, 2009

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं


यह दीपावली आपके पूरे परिवार के लिए ढेर सारी खुशियां और समृद्धि लाए। तरक्की के नए रास्ते खोले और सपनों को सच करने की एक नई शुरुआत बने। यह दीपावली हमारे ब्लॉगर परिवार के लिए भी नया दौर लेकर आए। इस दीपावली आप अपने परिवार को पूरा समय दें और बच्चों को ढेर सारा दुलार।


दीपावली मुबारक

Saturday, October 10, 2009

वो शमा क्या बुझे जिसे रौशन खुदा करे...


मैं 18 स्वर्ण पदक जीतने वाली तैराक (नताले डू टॉएट) हूँ। मेरा सिर्फ एक पैर सलामत है। ओलंपिक और कॉमनवेल्थ खेलों में अपने खेल का लोहा मनवाने के बाद अब मैं 2012 में लंदन में होने जा रहे ओलंपिक की तैयारियों में जुटी हूँ। वह 25 फरवरी, 2001 की सुबह थी, जब मैंने अपना बायां पैर केपटाउन (दक्षिण अफ्रीका) में एक कार एक्सीडेंट में खो दिया। मैं हर रोज की तरह अपने स्कूटर पर तैराकी की प्रैक्टिस के लिए स्कूल जा रही थी। एक कार ने मेरे स्कूटर को टक्कर मारी और मेरा बायां पैर टूट गया। पैर की हड्डियां और मांसपेशियां कुछ इस तरह कार से कुचल गईं, जिन्हें जोड़ पाने में डॉक्टर भी असमर्थ थे। हादसे के सातवें दिन डॉक्टरों ने मेरा पांव घुटने से काट दिया था। चौदह बरस की उम्र में मैंने उस पांव को खो दिया, जिसकी मेरी जिंदगी और तैराकी में भी खासी अहमियत थी। इससे पहले क्वालालांपुर में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स (1998) में मैं तैराक के तौर पर भाग ले चुकी थी। ...लेकिन मेरी आगे की कहानी एक नई शुरुआत के साथ बुनी जानी थी।


हादसे के बाद मैंने ढेर सारी मुश्किलों का सामना किया। कभी खुद को विकलांग नहीं समझा, लेकिन कदम-कदम पर जूझना पड़ा। अपने सामथ्र्य में जितना था मैंने किया। सिर्फ एक सपना पाला कि 'मैं सब कुछ कर सकती हूँ। सब कुछ करूंगी।' हादसे के पांच महीने बाद मैं वापस स्वीमिंग पूल में लौटी और सालभर बीतते-बीतते मैंने अपने आधे पांव को साथ लेकर तैरना सीख लिया। इसी समय मैनचेस्टर में हो रहे कॉमनवेल्थ गेम्स में मैंने डिसेबल्ड स्विमर्स की श्रेणी में 50, 100 और 800 मीटर तैराकी में भाग लिया। यहीं मुझे 'डेविड डिक्सन अवॉर्ड' आउटस्टैंडिंग एथलीट ऑफ द गेम्स के तौर पर दिया गया। इंग्लैंड के विस्टा नोवा स्कूल के विकलांग बच्चों की मदद के लिए भी मैंने कई तैराकी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। जोहांसबर्ग में आयोजित इस प्रतियोगिता में 12-13 डिग्री ठंडे पानी और शार्क के बीच साढ़े सात किमी। तक तैराक को पानी में जूझना होता है। मैंने 7.5 किमी. की ओपन वॉटर स्विम को 1:35:45 घंटे में पूरा करके विश्व रिकॉर्ड भी बनाया है। 2003 के एफ्रो एशियन गेम्स में मुझे रजत और कांस्य पदक भी मिला है। फ्रीस्टाइल तैराकी की कॉमनवैल्थ और पैराओलंपिक प्रतियोगिताओं में भी मैं हिस्सा ले चुकी हूँ। 2006 में मैंने चौथी आईपीसी वल्र्ड स्विमिंग चैंपियनशिप में भी छह स्वर्ण पदक जीते। बीजिंग ओलंपिक (2008) में 10 किलोमीटर ओपन वॉटर स्विमिंग रेस में मैंने हिस्सा लिया और मैं सोलहवें नंबर पर रही। यहीं बीजिंग के पैराओलंपिक में मैंने पांच स्वर्ण पदक जीते।


दक्षिण अफ्रीका के ब्रॉडकास्ट कॉर्पोरेशन की ओर से कुछ समय पहले जारी टॉप 100 ग्रेट साउथ अफ्रीकंस की सूची में मुझे 48वां स्थान मिला। मुझे 2008 के समर ओलंपिक्स की ओपनिंग सेरेमनी में अपने देश का झंडा पकडऩे वाले खिलाड़ी के तौर पर भी चुना गया। अब मैं लंदन (2012) में होने जा रहे ओलंपिक की तैयारी में जुटी हूँ। जो दर्द और वक्त की मार मैंने झेली है वह आसानी से मुझे तोड़ सकती थी, लेकिन अब मेरा भरोसा और मजबूत हो गया है। अब मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकती हूँ, 'अगर मैं सपना पूरा कर सकती हूँ, तो कोई भी कर सकता है।'

Wednesday, October 7, 2009

देश का कोई भी ज्योतिषी सामने आए! सात सवाल जवाब तलाश रहे हैं?


336 घंटे का इंतजार। परीक्षा के 14 दिन। हिंदी ब्लॉगिंग में ज्योतिष का सबसे बड़ा बवाल। आप इसे जो नाम देना चाहें, दे सकते हैं। ...लेकिन लंबे इंतजार के बाद हमारी ज्योतिषी ब्लॉगर संगीता पुरी जी उन सात यक्ष प्रश्नों का जवाब देने से पीछे हट गई हैं, जिनसे जुड़े दावे उन्होंने कुछ दिन पहले किए थे। वे उन सातों सवालों की गंभीरता से दूर 'भूत-भविष्य' की ऐसी गणित में उलझी हैं, जिनका कोई 'लॉजिक' नहीं है।

अब यह सात सवाल स्वतंत्र मंच पर हैं। देश का कोई भी ज्योतिषी इनके जवाब देने के लिए स्वतंत्र है। आप अपने आप से, आपके पड़ोसी ज्योतिषी, जानकार ज्योतिषी सब से इन जवाबों की मांग करें। इन सवालों को उसी प्रकार बुना गया था, जिस प्रकार के दावे सच होने की बात संगीता पुरी जी ने अपने गत्यात्मक ज्योतिष को लेकर कही थी। लेकिन जवाबों की जिज्ञासा अब भी बरकरार है।

सात सवाल :-

1.राहुल गांधी की शादी किस तारीख को होगी?
2.गुरुवार 31 दिसंबर, 2009 को सेंसेक्स किस पॉइंट पर बंद होगा (25 पॉइंट की छूट ले सकती हैं)?
3.विश्व का अगला बड़ा आतंकी हमला किस देश में, किस दिन होगा?
4.सिविल सर्विस बैच - 2009 के टॉपर के नाम का प्रथम अक्षर क्या होगा?
5.चीन भारत पर अगला हमला किस दिन (कृपया तारीख बतलाएं) करेगा?
6.31 दिसंबर 2009 को दिल्ली का न्यूनतम और अधिकतम तापमान कितना-कितना रहेगा?
7.अफगानिस्तान में 31 दिसंबर तक 'नाटो' के कुल मरने वाले सैनिकों की संख्या क्या होगी?


संगीता जी ने ज्योतिष में सच्ची भविष्यवाणियां करने का दावा किया था। उस दावे से जुड़ी एक मेल मुझे की और कहा था कि मैं उस मेल में भेज गए दो ब्लॉग लिंक पर लिखी बातों को पढ़कर उनका जवाब अपने ब्लॉग पर पोस्ट के रूप में दू। यह सवाल, मुद्दा उसी ई-मेल की देन है। अब अगर वे अपने ही दावों से पीछे हट गई हैं, तो उन्हें उनका ज्योतिष ज्ञान मुबारक हो। इस स्वतंत्र मंच पर स्वतंत्र सवाल, स्वतंत्र जवाब की, स्वतंत्र कोशिश कर रहे हैं। आप सबका जवाबों के लिए ब्लॉग मंच पर स्वागत है।


कृपया इस पोस्ट के लिए किसी भी प्रकार की टिप्पणी देने के लिए यहां (संगीता पुरी जी : ज्ञान और तर्क का प्रदर्शन अपेक्षित है!) क्लिक करें।

Friday, September 25, 2009

संगीता पुरी जी शुभकामनाएं। समय सीमा 14 दिन हुई!


आपके ब्लॉग को पढ़कर पता चला कि आप दुर्गापूजा पर बाहर जा रही हैं और हो सकता है सप्ताहभर बाद लौटें। आप दुर्गा पूजा करें। अपने परिवार के साथ-साथ सब ब्लॉगर्स के लिए कामना करें। आपका ईष्ट के प्रति समर्पण भाव का सम्मान करता हूँ। मुझे वाकई खुशी है कि आप पूजा पर बाहर जा रही हैं, इसीलिए पूजा-पाठ के ये सात दिन पूरी तरह ईश्वर को समर्पित।


आप लौट कर आएं और एक सप्ताह बाद इत्मिनान से सात दिन अध्ययन करें। उसके बाद मेरे सात सवालों का जवाब दें। मैं नही चाहता कि आपको समय ना मिल पाए। आप अध्ययन को पूरा वक्त दें। मैंने अपनी पोस्ट (संगीता पुरी जी : ज्ञान और तर्क का प्रदर्शन अपेक्षित है!) 23 सितंबर, 2009 रात 11 बजकर 12 मिनट पर लिखी है। मैं आपके जवाबों का इंतजार 7 अक्टूबर, 2009 के रात 11 बजकर 11 मिनट तक करूंगा। क्योकिं तब तक 336 घंटे मुझे पोस्ट लिखे हो जाएंगे। यानी पूरे 14 दिन।


मुझे सवालों के जवाबों का इंतजार रहेगा...


कृपया इस पोस्ट के लिए किसी भी प्रकार की टिप्पणी देने के लिए यहां (संगीता पुरी जी : ज्ञान और तर्क का प्रदर्शन अपेक्षित है!) क्लिक करें।

Wednesday, September 23, 2009

संगीता पुरी जी : ज्ञान और तर्क का प्रदर्शन अपेक्षित है!


संगीता जी मैं तो अज्ञानी (ज्योतिष को लेकर) हूँ, कहा से समझूंगा? आप तो ज्ञान रखती हैं ज्योतिष का। उसका प्रचार-प्रसार भी पूरी लगन, मेहनत और समर्पण से कर रही हैं। आपके प्रयार सिर-माथे। पूरा सम्मान करता हूँ। ...लेकिन बात बढ़ते-बढ़ते यहां तक आ गई है कि इसे उद्देश्य तक ले जाना अब जरूरी हो गया है। मैंने आपकी 10 अगस्त, 2009 को लिखी पोस्ट पढ़ी, जिसमें 15 अगस्त को बारिश होने की भविष्यवाणी आपने की थी। बारिश भी हुई। उसे पढऩे और आपके निवेदन के बाद जो विचार मेरे दिल-दिमाग में उठे हैं, उन्हीं की वजह से यह पोस्ट तैयार हुई है।

संगीता जी आप कहती हैं, 'ज्योतिष का हर विषय से ताल्लुक है।' मैं आपकी बात से सौ फीसदी सहमत हूँ। ...तो इसीलिए सात अलग-अलग विषयों जिनमें राजनीति, स्टॉक मार्केट, आतंकवाद, शिक्षा, युद्ध, मौसम और कूटनीति शामिल हैं के सात सवाल मैने आपके ज्योतिष के लिए बनाए हैं। इन सातों सवालों का जवाब आप अगले सात दिनों में गहन अध्ययन करके आराम से दे दीजिए। उसके बाद मेरे ये सवाल और आपके जवाब इस सार्वजनिक मंच पर लॉक हो जाएंगे। वक्त की मुट्ठी खुलने पर जब भी इन सवालों के जवाब सामने आएंगे, तब अगर आपका एक भी जवाब सटीक रहा तो मैं और मेरे जैसी सोच रखने वाले साथी मान लेंगे कि आपका ज्योतिष, आपकी गणित, आपकी भविष्यवाणियां सत्य होती हैं। हम आपके दंडवत हो जाएंगे।

सात सवाल :-

1.राहुल गांधी की शादी किस तारीख को होगी?
2. गुरुवार 31 दिसंबर, 2009 को सेंसेक्स किस पॉइंट पर बंद होगा (25 पॉइंट की छूट ले सकती हैं)?
3. विश्व का अगला बड़ा आतंकी हमला किस देश में, किस दिन होगा?
4. सिविल सर्विस बैच - 2009 के टॉपर के नाम का प्रथम अक्षर क्या होगा?
5. चीन भारत पर अगला हमला किस दिन (कृपया तारीख बतलाएं) करेगा?
6. 31 दिसंबर 2009 को दिल्ली का न्यूनतम और अधिकतम तापमान कितना-कितना रहेगा?
7. अफगानिस्तान में 31 दिसंबर तक 'नाटो' के कुल मरने वाले सैनिकों की संख्या क्या होगी?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि अगर आप इन सातों सवालों के जवाब रूपी भविष्यवाणियों को कर देती हैं, वह सही होती हैं, तो आपका गत्यात्मक ज्योतिष विश्व प्रसिद्ध हो जाएगा। इस समय दस हजार से ज्यादा लोग हिंदी ब्लॉगिंग कर रहे हैं, एक साथ इतने बड़े पाठक वर्ग तक आपके ज्योतिष के ज्ञान और तर्क का संगम देखने को मिलेगा। अगर आपके सातों जवाब सही निकले मैं खुद आपके गुरुत्व में ज्योतिष का गहन अध्ययन शुरू कर दूंगा। सारे तर्क दरकिनार कर दूंगा। इन सातों सवालों का सात दिन में जवाब जरूर दीजिएगा। क्योंकि ज्ञानी व्यक्ति (विषय का ज्ञान रखने वाला) के लिए एक सवाल का जवाब तलाशने के लिए 24 घंटे मेरे हिसाब से तो पर्याप्त समय होता है। बस एक निवेदन है कृपया प्रत्येक सवाल का जवाब सटीक दीजिएगा। शब्दों में ना घुमाइएगा। क्योंकि यह सवाल सटीक जवाब की ही अपेक्षा रखते हैं। ये सात भविष्यवाणियां साबित कर देंगी, कि आपके गत्यात्मक ज्योतिष का कोई सानी नहीं है।


आपकी सात भविष्यवाणियों का पूरा ब्लॉग जगत इंतजार कर रहा है....

Tuesday, September 22, 2009

'आधा भारत' यहीं से निकला है...

मैं तो इसे बेमिसाल परवरिश ही कहूँगा। क्योंकि यहां के बच्चे-बच्चे में एक एंटरप्रेन्योर बसता है। कह सकते हैं कि 'आधा भारत' यहीं से निकला है। आधा भारत इसलिए क्योंकि देश-दुनिया के बड़े एंटरप्रेन्योर्स और औद्योगिक घरानो में से ज्यादातर शेखावाटी से ही ताल्लुक रखते हैं।
मैं बचपन से बुजुर्गों से बिडला परिवार की कहानी सुना करता था। बुजुर्ग कहते थे, 'बिडला जी कम उम्र में ही कमाने निकल गए थे। हाथ में बस कुछ बर्तन और एक जोड़ी कपड़े थे। कुछ सालों बाद जब वापस लौटकर आए, तो बड़े सेठ बन गए थे। बहुत मेहनती थे।' मैं नहीं जानता कि इस कहानी में कितनी सच्चाई थी, लेकिन संदेश जरूर था। संदेश कुछ करने का, वैसा ही जैसा बिडला जी ने किया। कुछ इतना बड़ा कर गुजरने का जिसकी कोशिश बिडला जी और उनके परिवार ने की। आपको आश्चर्य होगा जानकर, कि यहां बड़े-बजुर्ग बच्चों को ऐसी ही कहानियां सुनाकर रात को सुलाते हैं, तो उनका दिल बहलाने और मन लगाने के लिए परी कथाओं की जगह यहां से निकले उद्योगपतियों के चर्चे छेड़े जाते हैं। एक रिदम सी है इन कहानियों में। कुछ कर गुजरने की, जोश और जुनून दिमाग में बिठा देने की रिदम। कल रात रतनसिंह शेखावत जी का ब्लॉग पढ़ते-पढ़ते लगा, क्यों न अपने शेखावाटी पर कुछ लिखा जाए। ...और क्यों न वह लिखा जाए, जिसमें हमारी भी परवरिश हुई।
मैंने सुबह उठकर दादाजी से इस बारे में चर्चा की, तो देखिए शेखावाटी के कितने उद्योगपतियों के नाम हम लोगों ने गिन लिए, जिनका विश्व उद्योग जगत में दबदबा है। शायद ये लोग न होते, तो भारतीय उद्योग जगत 'अधूरा' ही रह जाता। यानी 'आधा औद्योगिक भारत।' आप जरा नजर दौड़ाएं, यह हर परिवार देश और दुनिया में के व्यावसायिक जगत में खासा दखल रखता है-
मित्तल : सुजानगढ़ (चुरू)
बिडला : पिलानी (झुंझुनूं)
पोद्दार : नवलगढ़ (झुंझुनूं)
गोयनका : डूंडलोद (झुंझुनूं)
खेतान : झुंझुनूं
मोरारका : नवलगढ़ (झुंझुनूं)
पिरामल : बग्गड़ (झुंझुनूं)
बजाज : सीकर
मोदी : लक्ष्मणगढ़ (सीकर)
तोदी : लक्ष्मणगढ़ (सीकर)
चमडिय़ा : फतेहपुर (सीकर)
इनके अलावा भी कई परिवार हैं, लेकिन मैंने बड़े औद्योगिक दखल वाले शेखावाटी के मारवाडिय़ों को ही शामिल किया है। तकनीकी तौर पर खंगालें, तो शेखावाटी की भौगोलिक परिस्थितियां कुछ ऐसी हैं, जिनमें सबसे ज्यादा ठंड, तो सबसे ज्यादा गर्मी भी लोगों को सहनी होती है। ऐसे में परिपक्वता का स्तर दूसरे क्षेत्रों में बसे लोगों से अधिक तो होता ही है, यहां के लोग शारीरिक व मानसिक रूप से भी अधिक सक्षम होते हैं। हालांकि कुछ इतिहासकार शेखावाटी में सिर्फ सीकर और झुंझुनूं को ही शामिल करते हैं, लेकिन स्थानीय परिवेश में सीकर, झुंझुनूं और चुरू तीनों को शेखावाटी के दायरे में गिना, पाया जाता है। सही मायने में एंटरप्रेन्योर्स कैसे बनते हैं, देखना हो तो आपको एक बार शेखावाटी जरूर आना चाहिए। यहां के उस भाव को जानने की जिज्ञासा लिए, जिसने देश को इतने बड़े उद्योगपति दे दिए, वह भी एक छोटे से इलाके से।
शेखावाटी के राजपूतों ने इसे वीरों की धरती का दर्जा दिलाया है। सलाम यहां के बुद्धिजीवियों को, मेहनतकश आम आदमी को, उद्यमियों को और उन वीरों को जिनकी बदौलत शेखावाटी का हर एक शख्स सर ऊंचा करके अपने साथ दूर किसी भी प्रदेश में मारवाड़ी का ठप्पा लगा सकता है।

संगीता पुरी जी को दंडवत प्रणाम!


आपको दंडवत प्रणाम संगीता पुरी जी। नवरात्र हैं यही कर सकता हूँ!!!! आज तो मैंने आपका नाम ही नहीं लिया! आप कैसे पहचान गए कि मैंने पिछली पोस्ट में आपके संदर्भ में लिखा है। सब ग्रहों की दशा है! क्या कहूँ। मैंने यह भी कब कहा कि मैं आपको हराने की कोशिश कर रहा हूँ? ...और आपके ज्योतिष की पहचान में खलल डाल रहा हूँ। जो लिखा है मेरे अपने विचार हैं।

...और रही बात ये उलाहना देने की कि 'मेरे जैसे लोगों ने ही भारतीय ज्ञान और भारतीय सभ्यता को समाप्त करने में बड़ी भूमिका निभाई है' - तो सुनिए पहली बात तो यह कि मेरी यह जानने में कतई दिलचस्पी नहीं है कि आपने यह बात अपने ज्योतिष या किसी दूसरे संदर्भ में कही है। क्योंकि संदर्भ पढऩे वाले समझ जाएंगे और आप खुद मान रही हैं कि ऐसी कुछ परंपराओं का ह्रास हुआ है, तो आप बचाने में जुटी रहें, मैं होता कौन हूँ आपको रोकने वाला? दूसरी बात, मुझे किसी सेंसर की जरूरत नहीं है, जहां से यह पता चले कि यह लिखना चाहिए था और यह नहीं लिखना चाहिए था। इस मौके पर लिखूं और किस मौके पर लिखूं। ये सेंसर बोर्ड के नियम कायदे मुझे पचते नहीं। दस हजार से ज्यादा हिंदी ब्लॉगर हैं, रोज हजारों लोग चिट्ठा लिखते हैं, आपको ऐसा ही क्यों लगता है कि मैं लिखता हूँ, तो आपको संदर्भ बनाकर ही लिखता हूँ? आप तो हर बात पर अपनी ही मार्केटिंग करने में जुटी हुई हैं।
हिंदी चिट्ठाकारों में कुछ ज्योतिषी ऐसे भी हैं जिन्हें अच्छे से पढ़ कर मैंने लंबी-चौड़ी टिप्पणियां दी हैं और माना है कि वह बेहतरीन ज्ञान ज्योतिष का रखते हैं। उन्हें भी मैंने ज्योतिषियों से पाला पडऩे पर मिले गोलमाल की बातें शेयर की हैं। अब ऐसी कोई टिप्पणी आपको नहीं दी, आपके ज्योतिष की तारीफ नहीं की, तो आप इसे मेरी गुस्ताखी क्यों मान रही हैं? क्या मक्खन लगाकर खुश करने से ही सब खुश रहते हैं। मुझे तो मक्खन लगाने की आदत है नहीं। ...और मोहतरमा उलाहना ना दें, क्योंकि मेरी निजी राय है कि ऐसे बेतोड़ वाले उलाहने वही देते हैं, जो खुद कुछ कर पाने में सफल नहीं हो पाते, समाधान नहीं निकाल नहीं पाते और निकाल पाते हैं, तो बची-खुची फ्रसटे्रशन। अगर आपको लगता है कि मुझ जैसे लोगों ने भारतीय ज्ञान और भारतीय सभ्यता को समाप्त करने में बड़ी भूमिका निभाई है, तो अब तक आप जैसे लोग कहां चले गए थे? अब तो सदियां बीत गई हैं! हमें, तो कहीं से भी नहीं लगता कि हमारी सभ्यता-संस्कृति, संस्कार समाप्त हुए हैं। अब दुनिया ग्लोबल होकर बदल रही है, परिवर्तन ऐसे में सहज हैं, तो खुद को उनके साथ ढालना भी सीखिए। आज जो परिवर्तन आप देख रही हैं यह सहज हैं। हर राष्ट्र का जैसे-जैसे विकास होगा, वहां यह सब देखने को मिलेगा ही। इतिहास खंगालिए मिलता भी रहा है। ...और यह भी बताइए सब ब्लॉगर्स को कि आपका ज्योतिष क्या कहता है कि आने वाले दौर में कौन सा ग्रह भारतीय संस्कृति और सभ्यता को जिस रूप में आप समझ रही हैं बचाने की कोशिश करेगा। हर चीज बातों को घुमाने और ग्रहों को चलाने से नहीं चलती। आप तो ब्लॉगिंग को ही ग्रहों से चलाने की कोशिश कर रही हैं?!!!
आप ज्योतिष को पहचान दिलाइए, मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं, हमेशा।

Monday, September 21, 2009

आशीष खंडेलवाल जी पर पोस्ट क्या लिख दी, ग्रह गड़बड़ा गए!


कुछ दिनों पहले ही बता रहा हूँ, कुछ दिनों बाद, कुछ होने वाला है ब्लॉगिंग में...। इसे मेरी नहीं ग्रहों की गणना समझिएगा। यूं समझिए ब्लॉगर्स के ग्रह गड़बड़ी के संकेत मिलने लगे हैं। कुछ तो गड़बड़ जरूर होने वाली है। एक ग्रह गणना और भविष्यवक्ता की ब्लॉगिंग या कहिए अमरवाणी में मैंने आज वह पढ़ा, जिसके बारे विचार ही नहीं किया था। आशीष जी के बारे में मेरा कुछ लिखना संदर्भों में खलल माना गया। गलत मौका माना गया। क्यों? क्योंकि ग्रह गड़बड़ा जो गए थे, उस दिन जब मैंने पोस्ट लिखी। ग्रह तो कईयों के गड़बड़ाए थे। पर पता नहीं किसके ग्रहों की गड़बड़ी थी कि मैंने आशीष जी पर पोस्ट लिखी। मैंने तो यह भी पढ़ा कि उस दिन की भविष्यवाणी पहले ही कर दी गई थी, कुछ होने वाला है गड़बड़।
वाह भई भविष्यवक्ताओं। आप सब ब्लॉगर्स से निवेदन है, मुझे कोई ऐसे भविष्यवक्ता से मिलाओ जो सच्ची बात बता सके। बता सके कि दो महीने बाद क्या होगा। चार दिन बाद क्या होगा। पांच साल बाद यह घटना घटेगी। अरे वह तो खुदा हो जाएगा भाई। सब मिलक पूजेंगे उसे। मैं उस नेक बंदे से निवेदन करूंगा सब ब्लॉगर्स की भविष्यवाणी भी करे और सबकी कुंडलियां भी बताए। पता तो चले, तो कब कौन सलटने वाला है, कब बवाल बनने वाला है, कब किसे पोस्ट लिखनी है और कब नहीं लिखनी है। अब अगर मैं कहूँ, कल कोई बवाल होगा ब्लॉग पर...। कोई माने या न माने, हर रोज ब्लॉग पर कोई न कोई बवाल होता ही है। ...तो लो हो जाऊंगा मैं भी भविष्यवक्ता। अब समझ नहीं आ रहा क्या लिखूं। किसी का नाम ले लूँगा, तो मेरी भविष्यवाणी सही हो जाएगी मैं भी भविष्यवक्ता हो जाऊंगा। फिर आप बोलेंगे, जाखड़ लिख दिया न किसी का नाम लेकर। पर जय हो भविष्यवक्ताओं की।
वैसे बहुत दिनों से कुंडली बनवाने की सोच रहा हूँ, कोई मिले, तो बताना आपकी मेहरबानी होगी। पर ब्लॉगिंग जैसी तकनीक को ही भविष्यवाणी से जोडऩे वाला मत बताना। क्योंकि जब से उस पोस्ट को पढ़ा है यही सोच रहा हूँ ब्लॉगिंग जैसी तकनीक की भी कुंडली बांची जाने लगी है। यह कैसे हो सकता है...?

Saturday, September 19, 2009

आशीष खंडेलवाल जी जहां खड़े हो जाएं, लाइन तो वहीं से शुरू होती है...


585 फॉलोवर्स, 203 प्रविष्टियां, 3396 टिप्पणियां और 1,44,101 क्लिक्स के साथ ब्लॉगर्स की मदद। ...और सब की सब बातें काम की। कोई मजाक थोड़े हो रहा है ब्लॉगिंग में। आशीष खंडेलवाल जी जैसे संजीदा और उम्दा ब्लॉगर्स की वजह से आज हजारों ब्लॉगर्स ब्लॉगिंग का पहला पाठ पढऩे में, तो कहीं पारंगत होने में कामयाब हो रहे हैं। ...मैं खुला समर्थन करते हुए ब्लॉगिंग के लिए बेधड़क कहता हूँ, 'आशीष जी जहां खड़े हो जाएं, लाइन वहीं से शुरू होती है।'


बीते शुक्रवार की रातभर मैं बैठा रहा। हम ब्लॉगर्स पढऩे से बचते है न..., उस रात मैंने आशीष जी के हिंदी ब्लॉग टिप्स की 54 पोस्ट बिना कंप्यूटर ऑफ किए, बिना कुर्सी से उठे पढ़ी। सिर्फ बीच में दो ग्लास पानी पीया, वह भी टेबल पर मिल गया था। कोई पागल कुत्ते ने थोड़े काटा था उस रोज मुझे, या दिमाग फिर गया था मेरा? कई सवाल आते हैं, ब्लॉगिंग में क्या बेहतर सीखें? क्या नया सीखें? मुश्किल से समय निकाल पाता हूँ, इसलिए जितना सीखने को मिल जाए मेरे लिए तो प्रसाद ही है।


मुझे याद है मैं ब्लॉगिंग में बिलकुल नया था। मेरे एक साथी ने हिंदी में ब्लॉग बनाया था। मैंने कहा था उनसे, 'भाईसाहब मुझे भी ब्लॉग बनाना है।' उन्होंने बड़े मिठास के साथ टरकाया था मुझे। बोले, 'बहुत लफड़े हैं जाखड़, टाइम नहीं है कि समझाऊं। ऐसे ही थोड़े होती है ब्लॉगिंग, बहुत दिमाग वाला काम है।' उस आदमी ने मुझे कभी कुछ नहीं बताया। कोई टिप नहीं दिया। आज तक। मैं तो बस टिप्स तलाश रहा था। आशीष जी का ब्लॉग गूगल में सर्च में मिला। सब्सक्राइब कर लिया। ज्यादा समझ नहीं आता था, इसलिए कभी मेल में आई पोस्ट पढ़ लेता तो कभी छोड़ देता था। धीरे-धीरे समझ बढ़ी। जब एहसास हुआ कि वो हर पोस्ट कीमती है, और पिछले सालभर में मैंने आशीष जी की बहुत सी पोस्ट ना पढ़कर बहुत कुछ खो दिया है, तो रातभर वक्त निकाला।


मैं लेखन से जुड़ा हूँ। इतना अनुभव हो गया है कि चार लाइन पढ़कर बता सकता हूँ कि लिखने वाला किस गहराई से लिख रहा है। घुमाने की कोशिश कर रहा है, खुद घूम रहा है या वाकई संजीदा बात कर रहा है। जब आशीष जी की 54 पोस्ट पढ़कर सोया, तो कतई महसूस नहीं हुआ कि मैंने अपना वक्त जाया कर दिया। अच्छी नींद आई। क्योंकि उनमें से चुनिंदा पोस्ट को मैंने फिर से अपने ई-मेल पर फॉरवर्ड कर लिया था, ताकि अगले दिन जैसे ही टाइम मिले, फिर उन्हें पढ़ सकूँ। इनके टिप्स उपयोग में ला सकूँ।


हम हर साल त्योहार मनाते हैं। नवरात्र आए हैं। आज सब पूजा पाठ करेंगे। इष्ट को याद करेंगे। ईद भी आ रही है। दिपावली भी आएगी, होली भी। क्यों? इतना उल्लास क्यों होता है उस दिन। क्योंकि देवताओं के प्रति पूज्य भाव हम रखते हैं। उल्लास से खुशी बिखेरते हैं। मानते हैं कि उन्होंने बिन मांगे हमें बहुत कुछ दिया है। ...तो आशीष जी का सम्मान करने में लोगों को कष्ट क्यों होता है। स्वीकार करने में घबराते क्यों हैं कि 'आशीष खंडेलवाल जी जहां खड़े हो जाएं, लाइन तो वहीं से शुरू होती है...।' एक आदमी हर रोज छह-आठ घंटे हिंदी ब्लॉगर्स के लिए निकाल रहा है। जिसके लिए खुद की पहचान से ज्यादा, हिंदी ब्लॉगिंग की पहचान मायने रखती है, उसका सम्मान पूरे जश्न से होना चाहिए। हर त्योहार, उत्सव, वार्षिकोत्सव की तरह उनका खुलकर सम्मान तो करो कभी। ताकि उन्हें लगे कि उन पर और जिम्मेदारी आ गई है, ब्लॉगर्स को और बेहतर टिप्स सिखाने की। ...ताकि हम उनसे और ज्यादा सीख पाएं। समझ पाएं। खुद को तकनीकी तौर पर विकसित कर पाएं।


आज नवरात्र है। मैं उन्हें तहेदिल से आभार और धन्यवाद देना चाहूँगा। आशीष जी कुछ लोगों को आपकी ब्लॉगिंग में सफलता से अपच हो रही है। होने दीजिए। आप बस हमें सिखाते रहें। हैप्पी ब्लॉगिंग करते रहें। शुक्रिया।


सभी ब्लॉगर्स को नवरात्र की शुभकामनाएं।

Friday, September 11, 2009

बिना हाथों के तैराकी में विश्व रिकॉर्ड ! आश्चर्य !


आपकी सांसे अटक जाएंगी, जब आप इस बिना हाथ वाले तैराक को जानेंगे। आपको पता चलेगा कि इस असाधारण प्रतिभा के धनी ने वह सब कुछ अचीव किया है, जो लोग दोनों हाथ होकर भी नहीं कर पाते। तैराकी में बिना हाथों के विश्व रिकॉर्ड बनाने वाले रूस के चर्चित तैराक इगोर प्लोत्नीकोव के हौसलों को जानें, उन्हीं के शब्दों में -

मैं जिंदा हूँ, क्योंकि मौत मुझे खौफजदा नहीं कर पाती। लोग अपाहिज को दया भाव से देखते हैं, लेकिन उनकी इसी नजर से मुझे नफरत है। आखिर क्यों मुझे या किसी भी अपाहिज को वो ऐसी निगाहों से देखते हैं, जिनमें तरस भरा हो। ...दया भाव भरा हो। मैंने बस उम्मीद पर अपना जीवन जीया है और अपने हौसले पस्त नहीं होने दिए। जानता हूँ, मुश्किलें तो हर इंसान को तोडऩे ही आती हैं, लेकिन मैं टूट जाना पसंद नहीं करता।

आपको खुशी होगी जानकर कि मैंने बिना हाथों के भी तैराकी में विश्व रिकॉर्ड कायम किया है। 2004 में एथेंस में हुए पैराओलंपिक खेलों में मैंने भाग लिया और तैराकी करते हुए 32.52 सैकंड में 50 मीटर की बटरफ्लाई स्वीमिंग में रिकॉर्ड बनाया। आप सोच रहे होंगे बिना हाथों के एक तैराकी प्रतियोगिता में मैं कैसे प्रतियोगी बन पाया, कैसे उन लोगों को टक्कर दे पाया, जिनके दोनों हाथ वहां सलामत थे और वो तैर रहे थे? लेकिन शायद जिसे सबने मेरी कमजोरी समझा, उसी मजबूती ने, मजबूत हौसले ने मुझमें जीतने की ज़ील पैदा की।

मैं सिर्फ इतना ही जानता हूँ कि जीजस ने किसी को भी बिना वजह इस दुनिया में नहीं भेजा है। न आपको न मुझे। वे चाहते हैं कि मैं कुछ बड़ा काम करूं। शुरुआत मैं कर चुका हूँ। जब आगाज ऐसा है, तो अंजाम भी अच्छा ही होगा। ...लेकिन बस आप किसी अपाहिज को कमजोर नजरों से मत देखना। एक हौसला देना उसे...। ऐसा हौसला जो उसमें दुनिया जीतने का जज्बा पैदा कर सके।

Sunday, September 6, 2009

बिना हाथ और पैरों के जिंदगी की जंग !


एक जगह आकर छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब, मैं-तुम सारी दूरियां मिट जाती हैं। जंग होती है, तो जिंदगी से जूझने की। हौसला बनाए रखने की। बिना दोनों हाथ और बिना दोनों पैरों के भी विजेता बनने का सपना बुनने और उसे पूरा करने का हौसला रखने वाले इस शक्स क्ले डायर को देखकर मुझे तो यही लगता है। ...कुछ न हो, तो भी कैसे हंसी-खुशी भी जिंदगी को जिया जाए, क्ले अपने शब्दों में बेहतर तरीके से बता सकते हैं-

अगर आपके हाथ-पैर सलामत हैं, तो अपने आपको खुशकिस्मत समझिए। मेरे न तो हाथ हैं न पैर। सिर्फ आधा हाथ है, वह भी ऐसा कि अब तक जिसने देखा, उसे हाथ के होने न होने में कोई अंतर नजर नहीं आया। आज तीस साल की उम्र में मेरी ऊंचाई मात्र 40 इंच और वजन 39 किलोग्राम है। मेरी पैदाइश हैमिल्टन, अल्बामा की है। मेरी पहचान सिर्फ इतनी ही नहीं है। एक पेशेवर मछुआरा, जो बिना हाथ-पैरों के 200 से ज्यादा मछली पकडऩे वाली प्रतियोगिताओं का आकर्षण रह चुका है, के तौर पर मेरी पहचान ज्यादा मजबूत है। आपको खुशी होगी जानकर कि इनमें 25 प्रतियोगिताओं में मैंने जीत हासिल की है।
हैमिल्टन में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने के बाद पांच साल का होते-होते मुझे खुद और दूसरे बच्चों में फर्क का पता चला। मेरे दोनों हाथ और दोनों पांव नहीं थे। एक 16 इंच का दायी तरफ आधा-अधूरा हाथ मेरे शरीर से चिपका था, जिसे कभी किसी ने इस अधूरे शरीर पर फायदेमंद नहीं समझा। एक छोटी व्हील चेयर मुझे बचपन में ही दिला दी गई। इसी से मुझे मां, तो कभी पिताजी स्कूल छोड़कर आते और वापस लाते। लेकिन अपने आधे हाथ का सहारा लेकर अपने छोटे-मोटे काम मैंने खुद करने शुरू कर दिए थे। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल का होते-होते मैंने मछलियां पकडऩी शुरू कर दी। जब पहली बार मछली पकडऩे गया, तो पूरी तरह डरा हुआ था। बोट को चलाने में मुझे बेहद डर लग रहा था। ...लेकिन मैं अंदर ही अंदर महसूस करता था कि डर के आगे जीत है। कुछ ही दिनों में मैंने संतुलन बनाना सीख लिया था, लेकिन ज्यादातर मछुआरे मेरी क्षमताओं को लेकर आशंकित रहते। उन्हें आश्चर्य होता मुझे देखकर कि मैं औरों जैसा नहीं हूँ और मैं उस तरीके से मछलियां नहीं पकड़ सकता। मैंने कुछ तरीके ईजाद किए जैसे अपने दांतों से गांठ लगाना और मछली कांटे में फंसते ही ठुड्डी का सहारा लेकर उसे बाहर निकाल लेना।
मछली पकडऩे के लिए बोट भी खुद ही ड्राइव करना बेहद मुश्किल होता है। कई बार मेरे दोस्त बोट ड्राइव करते हैं और मछलियां पकडऩे के लिए मैं छड़ को अपनी ठुड्डी का सहारा देता हूँ। मछली पकडऩे के कांटे में गांठ लगानी हो, तो अपनी जीभ और दांतों की मदद लेता हूँ। मुझे तैराकी पसंद है। जब भी मछली पकडऩे की कोई प्रतियोगिता होती है, तो पूरा शरीर थककर चूर हो जाता है। ऐसे में अपने शरीर को रिलैक्स देने के लिए मुझे अगले ही दिन स्वीमिंग करनी पड़ती है। मैं जानता था कि मुझमें सीखने की इच्छाशक्ति कूट-कूट कर भरी है और मैं जितना समय मछलियां पकडऩे में दूंगा, मेरा हुनर उतना ही संवरता चला जाएगा।

जब भी दूसरे मछुआरे मुझे देखते थे, वह समझ ही नहीं पाते कि यह आधे हाथ वाला आदमी मछली कैसे पकड़ेगा? मैं हमेशा सिर्फ इतना ही सोचता हूँ कि जहां हूँ, वहां सबसे बेहतर क्या कर सकता हूँ? मुझे बचपन से बेसबॉल खेलना पसंद रहा है। मैं हमेशा जानता था कि मैं कभी पेशेवर बेसबॉल खिलाड़ी नहीं बन पाऊंगा, लेकिन मेरा पक्का विश्वास था कि मैं बेहतरीन पेशेवर मछली पकडऩे वाला बन सकता हूँ। ...और मैंने सही सोचा था। मुझे लगता है मैं वही कर पाता हूँ, जो ईश्वर मुझसे करवाना चाहता है।

Tuesday, September 1, 2009

मैंने मौत को मात दी है!


आपका दिल पसीज जाएगा। जब आप दो टुकड़ों में कटे शरीर के साथ सालों तक जिंदगी की जंग में जूझते इस शक्स के बारे में जानेंगे। हादसों और हकीकत के बीच इतनी कम दूरी शायद ही किसी को देखने को मिलती है। ...अंत के बाद जिंदगी कैसे शुरू होती है, हम सब इस शक्स से सीख सकते हैं। मौत को मात देकर भी जिंदादिली की मिसाल बने पिंग शुइलिन के दर्द और हादसों की कहानी, उन्हीं की जुबानी-

मैंने हादसों में जिंदगी को जिया है। बेहद करीब से जाना है कि जिंदगी जब दर्द देती है, तो उसे उठाने की ताकत भी देती है। चीन के हुनान में मेरा जन्म हुआ। रोजी-रोटी चलाने के लिए मैंने शेनजेन की एक आटा चक्की में नौकरी शुरू कर दी। उस दिन की पूरी यादें मेंरी याद्दाश्त में नहीं हैं, जब एक सड़क हादसे में मेरा शरीर ट्रक के नीचे दबने से दो टुकड़ों में कट गया था। मैंने अपने दोनों पांव खो दिए थे। मैं नहीं जानता की बेहोशी की हालत में मुझे किसने अस्पताल पहुंचाया, लेकिन शरीर के उन चिथड़े हो चुके अंगों के बावजूद आज मैं जिंदा हूँ।

उस हादसे ने मुझे एक सामान्य कद काठी से मात्र 78 सेंटीमीटर यानी अढ़ाई फुट का ही छोड़ा। चाइना के रीहैबिलिटेशन रिसर्च सेंटर के 20 चिकित्सा वैज्ञानिकों के एक दल की छोटी सी आशा ने मुझे मौत से लडऩे की ताकत दी। मैं सालों तक बिस्तर में जिंदगी और मौत के बीच जूझता रहा। जब मैं बचने की स्थिति में नहीं था, डॉक्टरों ने अपना पूरा दम लगा दिया मुझे जिंदा रखने के लिए। मेरे सिर की चमड़ी उतार दी गई और उससे मेरे कटे धड़ को सिला गया। इन्हीं डॉक्टरों ने मुझे प्लास्टिक का बना शरीर दिया, जो दिखने में अंडे जैसा है और मेरे दोनों कृत्रिम पैर जोड़े गए। हादसे के बाद होश आने से लेकर आज तक मैंने सिर्फ यही सोचा है कि एक दिन मैं सामान्य होकर चलंूगा, दौडूंगा। वह सब करूंगा, जो पहले अच्छा-भला शरीर होते भी न कर पाया।

चीन के ही 20 डॉक्टरों ने मुझे मौत का सामना करने की ताकत दी। उन्होंने इस उम्मीद को सालों तक कभी खत्म नहीं होने दिया कि मैं एक दिन फिर से चल पाऊंगा। मेरे बेटे और पत्नी ने मुझे फिर से उठने में जितना सहयोग किया, कोई दूसरा नहीं कर सकता। वे दोनों मुझे हर कदम पर प्रोत्साहित करते हैं। पैरों पर चलने का क्या सुकून होता है, एक बार फिर मैंने महसूस किया। यह करिश्मा है। मेरे लिए यह बेहद रोमांचक भी है कि अब मैं अपने दांत खुद साफ करता हूँ। अपना मुंह खुद धोता हूँ और अपने हाथों को और मजबूत बनाने के लिए वर्जिश करता हूँ। सबकी तरह मैं भी अपने पैरों में स्पोट्र्स शूज पहन सकता हूँ।

मेरी तस्वीर देखकर ही आप समझ जाएंगे कि मौत ने मुझे हराने के लिए मेरा कम पीछा नहीं किया, पर जिंदगी के लिए मेरा संघर्ष चलता रहेगा। भोजन करने के लिए जब एक ही हाथ हिला पाता हूँ, तो बहुत अटपटा लगता है, क्योंकि दूसरे हाथ से मुझे अपने शरीर का बैलेंस बनाना होता है। वैसे भी भोजन करना ही मेरे लिए मुश्किल भरा होता है। अब मैं अपना अखबार और पत्र-पत्रिकाएं बेचने का व्यापार शुरू करना चाहता हूँ। यह जीवन अनमोल है, इसे सार्थक बनाने के लिए अपने दम पर बहुत कुछ करने की इच्छा है। एक बार फिर, नए जोश और नई उमंग के साथ।

Wednesday, August 26, 2009

हुड्डा सरकार (जनहित) का यह कैसा गोलमाल!



जय हो! के नारे के बाद केन्द्र में कांग्रेस की वापसी ने एक बात तो साबित कर दी थी कि पी.आर. (पब्लिक रिलेशंस) की अहम भूमिका अब बनने लगी है। कांग्रेस को पी.आर. का लाभ लोकसभा और राजस्थान विधानसभा चुनावों में मिला भी था। ...लेकिन हरियाणा में जल्द होने जा रहे विधानसभा चुनावों के मद्देनजर हाल ही हुड्डा सरकार के एक विज्ञापन 'नंबर 1 हरियाणा' में बड़ी गोलमाल नजर आ रही है।


देश के प्रमुख चैनलों पर प्रसारित होने वाले 'नंबर 1 हरियाणा' विज्ञापन के अंत में लिखा है, 'सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, हरियाणा द्वारा जनहित में जारी', जबकि पूरे विज्ञापन में दिखाए जाने वाले क्लिपिंग में 'कांग्रेस' का बखान किया गया है। कांग्रेस की रैलियां, झंडे, बैनर ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। इसमें 'जनहित' कहीं भी नजर नहीं आ रहा। भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को जमकर प्रमोट किया गया है। यह सही है कि हुड्डा मुख्यमंत्री हैं और जनसंपर्क विभाग उनके विज्ञापन जारी कर सकता है, उन्हें प्रमोट कर सकता है। लेकिन जल्द होने जा रहे चुनावों के मद्देनर इन विज्ञापनों को कुछ इस तरह प्लान और डिजाइन किया गया है, जैसे आगामी चुनावों की तैयारियों में कांग्रेस का प्रचार करने के लिए जनसंपर्क विभाग सरकारी खजाना खाली कर रहा है। इन विज्ञापनों को देख कर साफ जाहिर हो रहा है कि कांग्रेस चुनावी तैयारियों के तहत अपने प्रचार के लिए पार्टी फंड की बजाय, सरकारी फंड का इस्तेमाल कर रही है। हरियाणवी गीतों, सांस्कृतिक पहलुओं और आंकड़ेबाजी के जोरदार संगम से लबरेज इन विज्ञापनों में हालांकि हुड्डा का जोरदार प्रचार किया जा रहा है, जिसकी मजबूत प्रस्तुति भी है। जिसके लिए इसे बनाने वाले बधाई के पात्र हैं, ...लेकिन वहीं इस पूरे विज्ञापन को देखने के बाद देखने वाला तब ठगा सा रह जाता है, जब गुणगान के बाद भी यह समझ नहीं आता कि आखिर इसमें 'जनहित' कहां हुआ? इस विज्ञापन से जनता का कौन सा हित सध रहा है?
आज शाम को ऑफिस से कॉलेज में एमबीए का टर्म टैस्ट देने के बाद जब मैं घर पहुंचा तो एनडीटीवी चल रहा था। टीवी पर घंटेभर में शायद तीन बार यह विज्ञापन आया और तीनों ही बार मैं समझ नहीं पाया कि 'जनहित' का यह कैसा गोलमाल है! लेकिन इस पूरे सीन में यह बात सबसे पुख्ता हो जाती है कि कांग्रेस को पी.आर. की परिभाषा अच्छी तरह समझ आ गई है। उचित समय पर संसाधनों का उचित इस्तेमाल, वह भी उचित पी.आर. के साथ कोई भी नेता या पार्टी कांग्रेस से सीख सकती है।


वैसे पी.आर. का दायरा जिस तेजी से और जिस तरह बढ़ रहा है, मेरी निजी राय है कि आने वाले दिनों में आप हर विधायक और हर सांसद के साथ निजी तौर पर नियुक्त किए गए जनसंपर्क अधिकारी भी देखेंगे। बिलकुल उसी तरह जिस तरह एक केन्द्र सरकार के विभाग, पीएसयू या किसी राज्य सरकार के जनसंपर्क अधिकारी होते हैं।। मीडिया प्रबंधन देखते हुए...।


आप इस विज्ञापन को जरूर देखिए और इसमें निहित 'जनहित' को समझ पाएं तो मुझे भी बताइएगा...!

Monday, August 24, 2009

भाजपा को जरूरत एक मैनेजमेंट फंडे की...!


भाजपा के बुद्धिजीवियों में बुद्धि होगी, तो 16वीं लोकसभा चुनावों वे बड़ी पार्टी के रूप में फिर निखर कर आएंगे। बुद्धि नहीं लगाएंगे, तो कोई शक नहीं कि पार्टी धूल चाट जाएगी। पिछली छमाही समीक्षा करें या तिमाही घटनाक्रमों को देखें, तो दोनों क्वाटर्स में कांग्रेस का ग्राफ जितनी तेजी से ऊपर की ओर गया है, भाजपा उतनी ही औंधे मुंह गिरती चली गई है।

ऐसे हालातों में दो ही बातें, हो सकती हैं। वीडियोकॉन की तरह अपनी ब्रांडिंग बदल दी जाए या फिर गोदरेज की तरह एक नई शुरुआत की जाए। इन दोनों ही बड़ी कंपनियों ने अपने बढ़ते व्यवसायिक घाटों और बिगड़ते हालातों के मद्देनजर डूबने से पहले ही बदलाव को स्वीकार कर लिया। आज बीजेपी के बौद्धिक नेता अरुण शौरी के बयान 'बीजेपी एक कटी पतंग है' के बाद अब पार्टी को बड़ी तब्दिलियों के बारे में मंथन शुरू कर देना चाहिए। आला नेताओं को स्वीकार करना चाहिए कि अब बदलाव का समय आ गया है। नहीं करेंगे, तो किसी को फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन पार्टी जरूर डूब जाएगी। दूसरी ओर अगले लोकसभा चुनावों के लिए राहुल गांधी को जहां कांग्रेस पीएम के लिए प्रोजेक्ट करने की पूरी तैयारी ग्रासरूट स्तर से कर रही है, वहीं अगर भाजपा में पार्टी पद पाने का लालच और ऊंचे कद का मोह नेताओं ने नहीं छोड़ा, अगले विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी पानी भी नहीं मांगने वाली है।

कुछ समय पहले पार्टी की दूसरी कतार में प्रमोद महाजन और सुषमा स्वराज जैसे नेताओं में जनता भविष्य तलाशने लगी थी, वहीं अब पार्टी को उस सोच से भी एक कदम आगे सोचने की जरूरत है। 'बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ' यही सोच कर सही, लेकिन वरुण गांधी सरीखे युवाओं में पार्टी ने भविष्य को नहीं सजोया, तो भी खतरा बरकरार रहेगा। हालांकि बीते चुनावों में वरुण गांधी ने जो इमेज बनाई, उसकी अपेक्षा आम आदमी नहीं कर रहा था, लेकिन युवाओं को आधार बनाकर जरूर पार्टी जिंदा रह सकती है। ...और सही मायने फंडा यही काम करेगा। भाजपा अपनी पूरी कमान ही अगर युवाओं को सौंप दे और सारे मस्ले भूलकर अगले छह-आठ महीने में खुद को मॉडरेट करने में झोंक दे, तो चार-साढ़े चार साल में चुनाव होते-होते उनमें जान जरूर बची रहेगी। वर्ना वह दिन दूर नहीं जब पार्टी, तीसरे और चौथे छोर पर जा टिकेगी।

Sunday, August 23, 2009

एनएसडीएल : एक करोड़ की कामयाबी !


एनएसडीएल अब एक करोड़ डी मेट खातों का प्रबंधन देख रहा है। किसी बैंक या कंपनी में अगर आपका डीमेट खाता है, तो अपना ई-मेल चैक जरूर करें, एनएसडीएल ने आपका आभार जताया है। पिछले दो साल में एनएसडीएल 40 लाख डीमेट खातों से जुड़ा है और ग्राहकों के एनएसडीएल में भरोसे को लेकर एनएसडीएल के प्रबंध निदेशक और सीईओ गगन राय की ओर से सभी खाताधारकों को आभार का ई-मेल भेजा जा रहा है।

एनएसडीएल से पिछले दो सालों में चालीस लाख खातों का जुडऩा और इसी दौराना स्टॉक मार्केट में गोते का दौर, इस बात का तथ्यात्मक प्रमाण है कि स्टॉक्स को लेकर आज भी बड़े पैमाने पर आकर्षण बरकरार है। गौरतलब है कि पिछले साल जनवरी में रिलायंस पावर के आईपीओ के बाद जब बाजार धराशायी होता चला गया, आम निवेशक का भरोसा बाजार से उठ गया था और लोगों ने अपने डीमेट या तो बंद करवा दिए थे या नए खुलवाने का खयाल बिलकुल छोड़ दिया था।

Friday, August 21, 2009

जर्सी नंबर 99!


बॉबी मार्टिन बिना पैरों वाले विश्व के इकलौते फुटबॉल खिलाड़ी हैं। ओहियो के एक साधारण परिवार में जन्में बॉबी का कद सिर्फ तीन फुट और एक इंच है। इनका वजन भी मात्र 117 पॉन्ड ही है। फुटबॉल के इतिहास में अपनी तरह के इस अनोखे खिलाड़ी की कहानी, इसी की जुबानी -

जर्सी नंबर 99! मुझे इसी नाम से जाना जाता है। मैं बिना पैरों वाला विश्व का एकमात्र फास्ट फॉरवर्ड फुटबॉलर हंू। पैरों के बिना संतुलन नहीं बन पाने के कारण मुझे अपने हाथों से पेंडुलम की तरह शरीर का बैलेंस बनाना होता है, लेकिन जब मैदान पर होता हंू, तो दर्शकों से खचाखच भरे स्टेडियम में एक आवाज में हूटिंग होती है ...और उस आवाज में बस मेरा ही नाम होता है। 3 नवंबर, 1987 को मेरा जन्म ओहियो के एक बिलकुल साधारण परिवार में हुआ, जहां सुविधाओं के नाम पर मेरे हिस्से केवल हौसला आया।

मैं सिर्फ तीन फुट का हंू और मेरा वजन मात्र 117 पॉन्ड है, लेकिन मेरे हॉसलों ने मुझे कभी कद में छोटा और अपाहिज नहीं समझने दिया। मेरी जिंदगी में कई मुश्किल दौर आए। मेरे ना चाहते हुए भी मुझे आस-पास के लोगों ने यह जताने की बार-बार कोशिश की कि मैं अपाहिज हूं। मेरा भाई फुटबॉल खेला करता था। उसी को देखकर मैंने इसे खेलना शुरू किया। जिन खिलाडिय़ों के दोनों पांव सलामत थे, मैं उनसे भी कहीं अच्छा फुटबॉल खेलता था। लेकिन मुझे मैदान में उतरने से रोक दिया जाता। एक बार मुझे रोकने के लिए नेशनल फेडरेशन ऑफ हाईस्कूल एसोसिएशन ने अपनी नियमावली का हवाला दे दिया। वे चाहते थे कि फुटबॉल के मैदान में उतरने वाला खिलाड़ी पैरों में जूते, घुटने पर पैड जरूर बांधे। ...लेकिन मैं जूते और पैड कैसे बांधूं? मेरे तो पांव ही नहीं हैं और ना ही घुटने? पैर ना होने की वजह से मैंने जूतों को अपनी गर्दन पर बांध कर खेलना शुरू कर दिया। आखिर उन्होंने मेरे खेल के आगे हार मान ली।

आज जब मैं स्टेडियम में खेलने उतरता हंू, तो मेरा परिचय 'द 2005 होमकमिंग किंग' कहकर करवाया जाता है। मैदान पर 5 से 15 गज की दूरी तक पूरी तरह मुस्तैद रहने के कारण कोच अर्ल व्हाइट मेरे खेल से बेहद खुश हैं। वे मुझे अपनी टीम में जान फूंकने वाला खिलाड़ी और मैदान पर छह फीट, छह इंच के किसी भी तेज खिलाड़ी से ज्यादा काबिल मानते हैं। मुझे याद है जब एक मैच के बाद मेरी प्रतिद्वंद्वी टीम ने मुझे सुपरमैन कहा था। उस दिन जब मैं मैदान से बाहर आया, 200 से ज्यादा लोग मेरा ऑटोग्राफ लेने और साथ फोटो खिंचवाने के इंतजार में खड़े थे।

Wednesday, August 19, 2009

'एम. ज्ञान' और 'नटखट बच्चा' इनकी लगाओ वाट!


'कुछ ब्लॉगर फटे में टांग अड़ाना अपना कर्तव्य समझते हैं। अपनी पहचान छिपा रहे हैं, क्योंकि डरते हैं।' यह सही है। मेरी विनम्र गुजारिश है सारे हिंदी ब्लॉगर मिलकर इनकी जांच करें। 'एम. ज्ञान' और 'नटखट बच्चा' यह दोनों नामी ब्लॉगर हैं, लेकिन अपनी पहचान छिपा कर अपनी हर पोस्ट में किसी न किसी सम्माननीय ब्लॉगर को बेवजह लपेटने का शगल रखते हैं।

फेक आईडेंटिटी (जाली पहचान) से ब्लॉग चलाने वाले एम. ज्ञान का ब्लॉग 'मूरख का ज्ञान' नाम से चल रहा है और 'नटखट बच्चा' इसी नाम से चलाया जा रहा है। इन दोनों की पोल-पट्टी कुछ लोगों को ब्लॉगजगत में पता भी चल चुकी है। लेकिन हौसला देखिए इन बिना 'पासपोर्ट' (बिना ब्लॉग जगत में असल पहचान के संदर्भ में) के यात्रियों का, हर किसी की ऐसी-तैसी करना अपना हक समझते हैं। ब्लॉगर्स को अपनी टिप्पणियों के प्रेशर में लाने की कोशिश करते (धमकाते) हैं, हर संभव दबाव बनाते हैं, फिर पतली गली देखकर सरक भी लेते हैं।

मैंने कई सारे ब्लॉग देखे। उन पर मिलने वाली बेनामी टिप्पणियों को देखा। अपनी पहचान छिपा कर ऊल-जुलूल टिप्पणियां देना, पहचान छिपा कर मुद्दा बनाने की कोशिश करना, लोगों के ब्लॉग बंद करवाने की धमकी देना और ब्लॉग जगत में खासा दखल रखने वाले, बेहतर ज्ञान रखने वाले ब्लॉगर्स को लपेटने में यह खुद को एक्सपर्ट समझते हैं। अगर ऐसा नहीं है, तो यह दोनों अपनी पहचान खोल कर सबके सामने रखें। चोरी क्यों कर रहे हैं? ...और सारे हिंदी ब्लॉगर्स से एक बार फिर विनम्र निवेदन है कि सब मिलकर इनको नंगा करें।

एम. ज्ञान की धमकी सुनिए, उन्होंने एक टिप्पणी के जरिए मेरी ही वाट लगाने की अपील की। दो दिन बाद पता चला, जनाब पतली गली निकल गए हैं। उन्होंने अपना वह लिंक हटा लिया है, जिससे वह मेरी वाट ब्लॉगर्स से लगवाना और मेरा ब्लॉग बंद करवाना चाह रहे थे। क्यों भैया। लग गई वाट! मेरा खुले मंच पर खुला निवेदन है इन बेनामे ब्लॉगर्स और बेनामे टिप्पणीकारों को एक्सपोज करने का अभियान चलाएं। सब मिलकर इनकी वाट लगाएं। मैंने तो इन्हीं से सीखा है। इसलिए इन्होंने जो लिंक मेरा ब्लॉग बंद करवाने के लिए जारी किया था, मैं इनकी वाट लगाने के अभियान के लिए वैसा ही लिंक डाल रहा हंू। वह भी अपनी पहचान के साथ। इन लिंक्स पर क्लिक करें और करते रहें, ताकि इन बेनामे ब्लॉगर्स से आपको, हम सबको छुटकारा मिले। (एम. ज्ञान की वाट लगाने के लिए यहां क्लिक करें, नटखट बच्चा की वाट लगाने के लिए यहां क्लिक करें)।
जब तालाब में दो चार मछलियां गंदगी करने लगें और तालाब को गंदा करने लगें, तो उन्हें निकाल फेंकना जायज होता है। वर्ना धीरे-धीरे पूरा तालाब गंदा कर देती हैं। आप सब ब्लॉगर्स से मेरा निवेदन है कि अगर ये ब्लॉगर अपनी पहचान उजागर नहीं करते हैं, तो इनकी हेट स्पीच (दूसरे ब्लॉगरों के बारे में घृणित वाक्य) के हमेशा के लिए बंद करना ही उचित है। मेरा मंतव्य स्पष्ट है। बेगाने ब्लॉगर्स को बाहर का रास्ता देखना ही पड़ेगा।
दो दिन पहले एक ब्लॉगर श्री विवेक सिंह की टिप्पणी मेरी एक पोस्ट पर आई थी, उन्होंने कहा था 'वाट से वाट मिलकर मैगावाट बन सकते हैं।' इसे सार्थक करने का वक्त आ गया है।

Monday, August 17, 2009

अलबेला खत्री जी का ढेर सारा आभार!


अलबेला खत्री जी। विनम्र निवेदन भरा आभार स्वीकार करें, क्योंकि आप बहुत ही 'उमदा' लिखते हैं। (जानता हंू कुछ ब्लॉगर्स फिर कहेंगे कि मैंने सार्वजनिक होकर क्यों लिखा। मेल पर लिखना था। ...पर क्या करता आपके सुंदर शब्द मुझे खींच लाए। सुंदर हैं, इसीलिए आपके ब्लॉग पर हैं)। यही संदेसा आपके ब्लॉग पर टिप्पणी के रूप में देना चाह रहा था, लेकिन सोचा पोस्ट से दूं, ताकि जिन्होंने आपकी पोस्ट नहीं पढ़ी, वह भी उसे जरूर पढ़ लें । जान लें आप जैसे वरिष्ठ कलाकर के शब्द कोष को भी। जान लें कि एक पत्रकार में क्या-क्या होना जरूरी है। ...और आपका ज्ञानकोष कितना उम्दा है पत्रकारों को लेकर। आपका नजरिया क्या है कवि, लेखक और पत्रकारों को लेकर (जबकि आपने खुद बतौर लेखक ही अपने ब्लॉग पर कुछ लिखा है)।

पत्रकारों के बारे में आपकी जानकारी के लिए शुक्रिया। खास तौर पर खोजी पत्रकारों को लेकर आपका ज्ञानकोष बहुत ही वृहद है, इसलिए ढेर सारी बधाई। आपकी पोस्ट पढ़कर मेरा भी ज्ञान कोष बढ़ा है। पता चला कि एक पत्रकार में क्या-क्या गुण होते हैं! आपने हर बात सही कही है। क्योंकि हर आदमी अपने दौर में सोचता है। अपनी सोच से पूरी दुनिया को जोडऩे की कोशिश करता है। आपने भी जोड़ा कि 'हर असफल कवि आलोचक बन जाता है। हर असफल लेखक पत्रकार बन जाता है। हर असफल पत्रकार खोजी पत्रकार बन जाता है।' भई वाह! आपका वृहद शब्द कोष। सलाम आपके शब्दकोष को। ...और सलाम आपके ज्ञानकोष को जिससे साभार आपने अपनी पोस्ट में बोफोर्स मामले तक का हवाला दिया। आपको जानकर दिलचस्प लगेगा और ज्ञानकोष बढ़ेगा कि बोफोर्स मामले को पूर दुनिया के सामने लाने वाले खोजी पत्रकार ही थे। तहलका के खोजी पत्रकारों का सरोकार ऐसे कई बड़े मामलों से रहा है।

रूसी करंजिया (जिनके नाम से आप जरूर वाकिफ होंगे, क्योंकि आप पत्रकारों के बारे में काफी जानते हैं) खुद एक खोजी पत्रकार (न जानते हों, तो मरे ब्लॉग पर थोड़ा परिचय है) थे, ने इस देश की खोजी पत्रकारिता को दिशा दी है। उनका बहुत बड़ा योगदान है खोजी पत्रकारिता में।
खोजी पत्रकार अपनी जान जोखिम में डाल कर मामलों को खोजता है। बाकी के लोग उसे अखबार या टीवी में देखकर चाय की चुस्कियों के साथ चर्चा करते हैं और मामला बाजू में कर देते हैं। गलत कह रहा हंू, तो मिलिए तहलका के सम्मानीय तरूण तेजपाल जी से, अरुण शौरी जी से और ढेर सारे उन युवा खोजी पत्रकारों से जो आए दिन अपनी जान जोखिम में डालते हैं, मामले लाते हैं, एक्सपोज करते हैं। ब्लॉग पर लिखना अलग बात होती है, खोजी पत्रकारिता अलग। खोजी पत्रकारिता को वाकई जानना चाहते हैं, तो कभी एक पत्रकार बनकर एक मामला खोजिए, गोपनीय दस्तावेज निकाल कर लाइए, पोल खोलिए घोटालों की, अपनी जान इस लिहाज से ही सही जोखिम में डालिए, तो सही खोजी पत्रकार होने के सही मायने आपके वृहद् शब्दकोष को और बढ़ाएंगे।

आप थोड़ा सा अपडेट होंगे यह जानकर कि वह पत्रकारिता अब चली गई है, जिसकी चर्चा आपने की है। वह जमाना जब पत्रकार या कलाकार बनना करियर का अंतिम विकल्प होता था। अब पत्रकार अपनी पसंद, लगन से पत्रकारिता का क्षेत्र चुनते हैं। अंतिम नहीं अपने पहले विकल्प के तौर पर पत्रकारिता में प्रवेश करते हैं। अब युवा संबंधित डिग्री करते हैं, सीखते हैं, अनुभव लेते हैं और हौसला रखते हैं, वह सब करने का जो पुरानी पीढ़ी नहीं कर पाई (मेरा बात पर भरोसा ना हो, तो जितने युवा पत्रकार ब्लॉगर हैं, उनसे खुली बहस करवा लीजिए। वह बता देंगे)। ज्यादा मैं नहीं कहंूगा। बस इतना ही कि कलाकार, रचनाकार, कहानीकार या पत्रकार सब एक जैसे होते हैं। यू समझिए भाई-भाई। आप भी कलाकार हैं, तो स्वाभाविक है आप हर बात समझते हैं। आपमें भी वही गुण हैं, जो इन सब में होते हैं। ...तो जो शब्द एक पत्रकार या खोजी पत्रकार को आपने समर्पित किए, वही आपको ससम्मान समर्पित करता हंू।

वैसे एक कलाकार को दुनिया जाने, इसलिए वह सबसे ज्यादा (अपनी कला के बाद) पत्रकारों के ही संपर्क में आता है। कोई भी कलाकार हो। आप भी बड़े कलाकार हैं, आपको इतना बड़ा बनाने में आपकी कला, योग्यता के साथ-साथ उस मीडिया और उन पत्रकारों का भी बड़ा योगदान रहा है, जिससे आपकी पहचान का दायरा बढ़ा है। अब आप सफल हो गए हैं, और उन सफल पत्रकारों को असफल करार दे रहे हैं, तो आपका और भी आभार।

मैं पिछले दो दिनों से पूरे विनम्र भाव से यही सोच रहा था कि मैंने अपना पक्ष रखा। जरूरी नहीं कोई सहमत हो न हो। सब टिप्पणीकारों ने अपना पक्ष रखा। उन टिप्पणीकार भाईयों की बात को भी वजन दिया जिन्होंने कहा कि प्रवीण भाई अब खत्म करो इस मामले को। लेकिन आपने इतने सम्मान के साथ लिखा, तो मेरा भी फर्ज बनता था कि मैं उसी सम्मान से उसे स्वीकार करूं।

आपका ढेर सारा शुक्रिया।

Saturday, August 15, 2009

आपका ब्लॉग शानदार है- चेतन भगत


कल दोपहर तकरीबन सवा बारह बजे, चेतन भगत से बात हुई। चेतन ने जैसे ही फोन उठाया बोले, 'कैसे हो प्रवीण जी? आपका ब्लॉग शानदार है। मैंने पढ़ा है।'
'लेकिन आज तो जंग छिड़ी हुई है चेतन जी'
'ऐसा क्या हो गया?'
'बस मैंने सच्ची बात लिख दी। बात कड़वी थी, कुछ लोगों को डाइजेस्ट नहीं हुई। सच्चाई कड़वी ही होती है न...।'
चेतन - 'सही कर रहे हो, लिखो। ब्लॉगिंग तो चीज ही ऐसी है, जिसकी इच्छा होगी पढ़ेगा। जिसकी नहीं होगी नहीं पढ़ेगा। लेकिन वाकई मैंने पूरा ब्लॉग देखा, अच्छा काम कर रहे हो।'

फिर हमारी बातचीत मुद्दे पर आ गई जिसके लिए मैंने फोन किया था। आज बातचीत पत्रिका के सभी संस्करणों (संपूर्ण भारत) में प्रकाशित हुई है। (बातचीत पढऩे के लिए कृपया इमेज पर क्लिक करें)

Friday, August 14, 2009

नए ब्लॉगर्स का दुलार हो। स्वागत हो...


मैं जानता हंू कुछ लोग आज पूरी रात ठीक से सो भी नहीं पाए। माफी चाहंूगा अगर मेरे कुछ लिखने से नींद उड़ी आपकी। अगर नहीं उड़ी, तो उडऩी चाहिए। हर एक ब्लॉगर की उडऩी चाहिए। क्योंकि मां-बाप जागते हैं, तो बच्चे ठीक से सो पाते हैं। मां का आंचल गीला होता है, लेकिन वह बच्चे को गीला नहीं होने देती। दुलार करती है। मैं तो सिर्फ इतना ही चाहता हंू, नए ब्लॉगर्स का दुलार हो। स्वागत हो। हर्ष के साथ, पूरे सम्मान के साथ। उनकी पोस्ट पढ़ कर। हम सब करें (जितना समय निकाल पाएं, भले ही उतना)। लेकिन जरूर करें।


आज ना मैं ये लिखंूगा कि मैंने क्या लिखा। ना ये कि संगीता पुरी जी ने क्या जवाब दिया, ना ये कि ब्लॉगर्स ने अपनी टिप्पणियों में किसकी बात का समर्थन किया। आप सब सही हैं। हर व्यक्ति सही होता है। कोई कभी गलत नहीं होता। किसी की बात, किसी का विचार, किसी की सोच खारिज नहीं की जा सकती।


( संगीता पुरी जी आपका सबसे ज्यादा आभार। पूरे मामले में मेरा 0.प्रतिशत भी उद्देश्य आपको आहत करना (जैसा कई टिप्पणीकारों ने कहा) नहीं था। अगर ऐसा कोई दूसरे ब्लॉग का मामला होता, तो भी शायद मैं कल ही बोलता। क्यों वह समय शायद आ गया था। ...और आप तो ज्योतिष की अच्छी जानकार हैं, विद्वान हैं, जानती हैं, हर बात का समय होता है। हर घटनाक्रम का समय होता है। वह भी निश्चित। क्योंकि एक विचार जब उठता है, तो उसके लिए एक नींव होती है, जो एक दिन में, एक पल में नहीं बल्कि कई बार उठे विचारों की एक प्रकिया से तैयार होती है)। यह मामला इतना उठा मतलब ब्लॉगिंग करवट ले रही है। जैसे लोकतंत्र करवट लेता है। बदलाव आते हैं। मुद्दे उठते हैं। समर्थक भी सामने आते हैं, तो विरोध प्रदर्शन करने वाले भी। ...और इन्हीं सब से विकास संभव होता है। ऐसा भी हो सकता है, यह सोचने का मौका मिलता है।

बी.एल. पाबला जी, मनीष कुमार जी, सुमो साहब, नयनसुख जी, महक जी, गिरिजेश राव साहब, रतनसिंह शेखावत सा, सुशील कुमार जी, मयंक भाई, सुरेश शर्मा जी, डॉ. अमर कुमार, निधी जी, गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' साहब, वाणी गीत, एम. वर्मा जी, महाशक्ति, किशोर चौधरी जी, भाई हेतप्रकाश व्यास, स्वच्छ संदेश : हिंदोस्तान की आवाज, रचना सिंह जी, निशांत मिश्र जी, अजय कुमार झा, सागर नाहर जी, अनिल कांत जी और युवा पत्रकार शशांक भाई और वो सारे ब्लॉगर्स जो मुद्दे तक आए, लेकिन टिप्पणी नहीं दे पाए। नहीं देने के भी कई कारण हैं, मैं उनमें नहीं जाऊंगा (किस-किस का शुक्रिया अदा करूं), लेकिन आप सबका शुक्रिया। इसलिए क्योंकि आप आए, सब कुछ पढ़ा, पढ़कर टिप्पणियां दी। लगभग चालीस लोग आए, सिर्फ इतनी सी अपेक्षा है सब मिलकर इतना प्रयास तो करो कि इतनी टिप्पणियां पढ़ कर एक नए ब्लॉगर को दें, फिर देखिए उसका उत्साह सातवें आसमान पर नहीं जाता क्या? वह कितना बड़ा ब्लॉगर साबित होता है? वह कितना प्रोत्साहित होता है?


आप सब ने पूरी विनम्रता के साथ इस मामले को पढ़ा। पूरी विनम्रता के साथ अपना पक्ष, अपना विचार रखा। सुझाव दिए। ढेर सारे सुझाव महत्त्वपूर्ण मिले। आप सबसे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विनम्रता भी सीखने को मिली।


सबका शुक्रिया। मामले उठाते रहें, ताकि सबको कुछ ना कुछ सीखने को मिले। पढऩे वालों को भी, लिखने वालों को भी, मामला उठाने वालों को भी। हिंदी ब्लॉगर्स एक विशाल परिवार है। इस पूरे परिवार की जय हो!


जन्माष्टमी के साथ आप सबको स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं। लड्डू गोपाल की जय कन्हैया लाल की(गिरिजेश राव साहब की टिप्पणी से साभार, क्योंकि मुझे इनकी टिप्पणी सबसे ज्याद पसंद आई। शुक्रिया गिरिजेश राव साहब)।

Thursday, August 13, 2009

'बहुत सुंदर...' संगीता पुरी! वाट लगा दी ब्लॉगिंग की!

बाप रे बाप! आप पहले इस टिप्पणी को पढ़ें-
बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लॉग जगत में स्वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिंदी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिंदी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

जानी पहचानी है? जरूर मैं तो हांफने लगा हंू। इस टिप्पणी को देखकर। शुरू-शुरू में मैंने भी दो-चार दिन शॉर्टकट मारने की कोशिश की थी। ऐसे ही कॉपी-पेस्ट टिप्पणी से। धाप (थक) गया था। चिट्ठाजगत से हर रोज एक मेल आता है, नए चिट्ठों पर टिप्पणी दें। दी। कोशिश की। पर हार गया। पर संगीता पुरी जी नहीं हारीं हैं। मुझे तो दो-तीन दिन में ही लग गया था कि कॉपी-पेस्ट टिप्पणी से तो मैं अपने ब्लॉग्र्स की ही वाट लगा रहा हंू। उन्हें बिना पढ़े ही बरगला रहा हंू। बंद कर दिया। ...पर इनका क्या करूं। जहां नए ब्लॉगर्स पर टिप्पणी देने गया, कन्नी काट कर निकल आया। क्या करता? संगीत पुरी जी की टिप्पणी ऐसे मिलती है, जैसे सांप वहां कुंडली मारकर बैठा है। बाप रे...। फिर मन इजाजत ही नहीं देता। हिम्मत ही नहीं होती, कि वहां मैं टिप्पणी दे दूं।

पिछले कई दिनों में मैंने ऐसे ढेरों ब्लॉग देखे, जो सुंदर नहीं थे। प्रयास अच्छा था। बुराई नहीं कर रहा हंू। लेकिन संगीता जी पहली ही लाइन मार जाती..। 'बहुत सुंदर।' अरे इस सुंदरता का अचार थोड़े ही डालना है। दो-चार मंझे ब्लॉग्र्स मिले। जिनके ब्लॉग्स टॉप 100 और टॉप 50 में हैं। उन्होंने नया ब्लॉग बनाया। मोहतरमा संगीता जी ने आव देखा न ताव, लगा दी वाट। 'बधाई हो। बहुत सुंदर। ज्ञान बांटते रहें...।'

संगीता जी, कहां से बांटेंगे ज्ञान? आप उन्हें ज्ञान के रूप में कॉपी-पेस्ट टिप्पणियां जो सिखा रही हैं। वो भी यही ज्ञान बांटेंगे। संगीता जी की टिप्पणी कॉपी करेंगे और चिपका देंगे, किसी नए नवेले ब्लॉगर को। मुर्गा समझ कर! अगर समय नहीं मिलता है, आप कम ब्लॉग्स पर जाओ। लेकिन बेचारों की वाट तो मत लगाओ। नए-नए हैं, उन्हें संस्कार तो दो कि कुछ लिखें। घर का बड़ा दारू पीएगा, सिगरेट पीएगा, आवारागर्दी करेगा, तो घर के बच्चे भी यही करेंगे। गलत कह रहा हंू, तो झांक कर देख लीजिए अपने अड़ोस-पड़ोस। आप, हम कॉपी-पेस्ट चिपकाएंगे। ...तो नए ब्लॉगर क्या संस्कार लेंगे। कॉपी करो और पेस्ट चेप दो। हो गई ब्लॉगिंग। लग गई वाट।

ऐसा करने के बाद एक भी ब्लॉगर मुझे ऐसा नहीं मिला, जिसने संगीता जी के इस कदम की सराहना की हो। बात चली तो यही कहा, 'उनकी टिप्पणी, समोसे में आलू की तरह है। पढ़ती भी नहीं हैं, क्या लिखा? क्यों लिखा? कोई दुखभरी बात भी पोस्ट में आई, चेप देती हैं, बधाई हो, बहुत बढिय़ा।'

भई मेरे तो बात ऊफान मार-मार कर सर पर से गुजरने लगी, तो सोचा लिख ही डालूं। बाकी सब ब्लॉगर्स के हवाले। मेरी बात गलत लगे, तो ब्लॉगर्स की राय जान लीजिएगा। जय हो!

आपसे निवेदन है, इस पोस्ट को भी बना पढ़े ही टिप्पणी दीजिएगा, 'बहुत सुंदर!'

मिलिंद सोमन : ग्लैमर की दुनिया का एक संजीदा दोस्त

मिलिंद सोमन से मेरी पहली मुलाकात छह साल पहले हुई थी। इस मुलाकात के साथ ही मिलिंद दोस्ती का ऐसा रिश्ता कायम कर गए, जो आज भी बरकरार है। बीते रविवार जब मिलिंद सोमन से फिर साक्षात्कार की बात मेरे एक वरिष्ठ साथी ने कही, तो छह साल पुरानी यादें ताजा हो गई। हालांकि साल में चार-छह बार मिलिंद से बातचीत होना, मिलिंद का फोन आना और अक्सर आने वाले एसएमएस जुड़ाव को बरकरार किए हुए थे, लेकिन फिर से एक बार अपने दोस्त को याद करने का बहाना मिल गया था। मैं रविवार की छुट्टी होने की वहज से घर पर था। फोन मिलाया, तो मिलिंद बोले, 'भाई शूटिंग कर रहा हंू। चेन्नई आया हुआ हूं। बताओ क्या करना है?' मैंने बातचीत की थीम बता दी। मिलिंद उस वक्त सैट पर जाने के लिए तैयार थे। बोले, 'प्रवीण, शॉट करके आता हंू। तब तक थोड़ा सोच लेता हंू।' कुछ देर बाद मिलिंद का एसएमएस आया। ...और फिर हमारी बातचीत हुई।

मिलिंद अपनी फिल्म 'रूल्स (प्यार का सुपरहिट फॉर्मूला)' के प्रमोशन के सिलसिले में जयपुर आए थे। मुझे पत्रिका में आए सालभर हुआ था और किसी फिल्म स्टार से यह मेरा पहला साक्षात्कार था। मुलाकात का समय तय हुआ और वह भी जयपुर हवाई अड्डे से आमेर के एक पांच सितारा होटत तक उनकी गाड़ी में मुझे बातचीत करनी थी। हम गाड़ी में बैठे और मैं कुछ पूछता उससे पहले उन्होंने मेरे बारे में जानना शुरू कर दिया। मुझे याद है जब मिलिंद ने कहा था, 'प्रवीण, शादी हो गई?' नहीं? 'तो जल्दी कर लो। कामकाज चलते रहते हैं। वर्ना मेरी तरह बुढ़ापे में करोगे। अभी तक मैंने शादी नहीं की है।' क्यों? 'कोई मिली ही नहीं?' ऐसा थोड़े होता है? 'मिलती कब। सोचा ही नहीं। हां सुपर मॉडल होने की वजह से लड़कियां मुझे पसंद करती हैं, लेकिन शादी की सोचने का टाइम ही नहीं मिला। तुम्हे पता है, जब मैं बीकॉम सैकंड इयर में था मुझे आधा घंटे रैंप पर चलने का पहला ऑफर आया। पचास हजार रुपए दे रहे थे। अब बीकॉम सैकंड इयर के स्टूडेंट को आधा घंटे के पचास हजार मिल जाएं, तो कौन नहीं बनेगा मॉडल। बस मैं कौन सा रुकने वाला था। बन गए मॉडल। तुम होते, तो तुम भी नहीं रुकते। कोई नहीं रुकता।'


मिलिंद के बाद मैं लगभग 40 से ज्यादा फिल्म स्टार और मॉडल्स से मिला। लेकिन मिलिंद जैसा जमीन से जुड़ा हुआ स्टार मैंने अभी तक नहीं देखा। शायद यही कारण है, मिलिंद आज भी जुड़े हुए हैं। एक अच्छे दोस्त की तरह।


मिलिंद के शब्दों में पढ़े, उनसे आजादी के बासठ साल बाद मिलिंद क्या सोचते हैं (इसके लिए इमेज पर क्लिक करें)

Sunday, August 9, 2009

चेतन भगत से चौदह सवाल!

चेतन भगत से मेरी हाल ही मुलाकात महज एक संजोग बन गई। सप्ताहभर पर पहले जिस मशहूर साहित्यकार के उपन्यास 'थ्री मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ' को लेकर मैं अपने दोस्त से चर्चा कर रहा, उसी से मेरी अचानक मुलाकात हुई।

चेतन भगत जयपुर आए। ...और लगभग 25-30 मिनट तक हम गुफ्तगू करते रहे। मुलाकात के एक दिन पहले एक्सीडेंट के कारण मेरा पांव हिलाना भी मुश्किल हो रहा था। चेतन से मुलाकात के लिए जब फोन आया, तो मैं अपने पट्टियां बंधे पांव के साथ बिस्तर पर था। फोन पर आवाज आई, 'आज शाम आप चेतन भगत के साथ हैं। चेतन आपसे बातचीत भी करेंगे और साथ ही डिनर लेंगे।'

एक तरफ टूटी टांग और दूसरी तरफ चेतन भगत। करता भी क्या? मैंने हां कह दी। शाम साढ़े सात बजे चेतन और उनकी मां के साथ मैं बैठा था। चौदह सवालों पर मेरी उनसे बातचीत हुई। चेतन ने स्वीकार किया कि इस बातचीत में कुछ ऐसे सवाल हैं, जिन्हें आज तक चेतन से किसी ने नहीं पूछा। होटल रमाड़ा में डिनर के चेतन के आग्रह पर मैंने हाथ जोड़ लिए। चेतन के चेहरे पर लगातार मुस्कुराहट बिछी रही कि मैं बिस्तर पर होकर भी उनसे मिलने चला आया। एक विनम्र युवा साहित्यकार से मेरी यह मुलाकात संजोग से कुछ इस तरह प्लान हुई, जैसे फिल्म चल रही हो और मैं परदे के सामने उसे बैठा देख रहा हंू।

चेतन भगत से मेरी मुलाकात और बातचीत (हिंदी ने मुझे अपनों से जोड़ा) को विस्तार से पढऩे के लिए इस तस्वीर पर क्लिक करें...

Wednesday, August 5, 2009

ब्लॉग पर लगाएं फ्री कैलेंडर


नए-पुराने ब्लॉगर्स के लिए अच्छी खबर है। अच्छी इसलिए क्योंकि मुझे अभी-अभी पता चली है। मैं अभी-अभी अरविंद श्रीवास्तव जी का शानदार ब्लॉग (http://www.janshabd.blogspot.com/) देख रहा था। उन्होंने अपने ब्लॉग पर कैलेंडर चटकाया हुआ था। ...और मेरे गैजेट्स में कैलेंडर था नहीं। बस फिर देर किस बात की थी। हमने भी चटका लगा दिया और चिपका दिया अपने चंचल से मन वाले, मस्ताने ब्लॉग पर कैलेंडर।

हां पसंद के मामले में भी मैंने अरविंद जी का साथ दिया है। इस मुफ्त कैलेंडर मुहैया करवाने वाली वेबसाइट पर ढेर सारे कैलेंडर हैं। लेकिन मुझे भी वही पसंद आया, जो अरविंद जी ने लगाया था। इसलिए सबसे पहले अरविंद जी का शुक्रिया कि उनकी टिप्पणी ने हमें कलेंडर दिलवा दिया।
आप भी फ्री कैलेंडर अपने ब्लॉग पर चिपकाएं। ...और चिपकाने के लिए बस यहां चटका लगाएं- http://www.free-blog-content.com/

ब्लॉग की खबर का असर - अभिनेता मनोज बाजपेयी ने की टिप्पणी एप्रूव


कल रात चर्चित अभिनेता मनोज बाजपेयी की ब्लॉगिंग को लेकर मैंने अपने ब्लॉग पर सवाल उठाया था। पक्ष में एक ब्लॉगर (उमर कैरानवी साहब (http://antimawtar.blogspot.com/)) ने अपना समर्थन भी दिया। आपको जानकर अच्छा लगेगा कि ब्लॉग की खबर का असर हो गया है। आधा ही सही, लेकिन कुछ हुआ है। जिस टिप्पणी को मनोज बाजपेयी तीन दिन से अपने मेल बॉक्स में दबाए बैठे थे, खबर चलते ही उन्होंने एप्रूव कर दी है (अकसर मनोज चौबीस घंटे की भीतर ही एपू्रव करते हैं)।


जैसा कि मैंने कल की ही पोस्ट में दावा किया था कि मनोज बाजपेयी अपने ब्लॉग को तो पढ़ते हैं, लेकिन अपने टिप्पणीकारों के ब्लॉग पर नहीं जाते। उन्हें कमेंट नहीं देते। जबकि वह इसका दावा पहले ही अपने ब्लॉग पर कर चुके हैं कि वह दूसरों के ब्लॉग पढ़ते भी हैं। मेरे इसी दावे की पोस्ट के कुछ अंश जो आज मनोज बाजपेयी की पोस्ट में टिप्पणी के रूप में भी सेव है, मैंने उन्हें भेज दिया था। जिसे कुछ ही घंटों में मनोज ने तीन दिन से दबाई टिप्पणी के साथ एप्रूव कर दिया है। आप उसे मनोज बाजपेयी के ब्लॉग (http://manojbajpayee.itzmyblog.com/) पर देख सकते हैं।


लेकिन असर अभी अधूरा है। देखना यह है कि मनोज बाजपेयी अगर अपने टिप्पणीकारों ब्लॉग पढ़ते हैं, तो उन्हें टिप्पणी देकर यह साबित भी करते हैं या नहीं। इंतजार कीजिए।


मनोज भाई से भी निवेदन है। अपनी बात को सही साबित तो करें भाईसाहब।

Tuesday, August 4, 2009

क्या मनोज बापजेयी ने झूठा दिलासा दिया?


मानों तो मामला 'बात के सवाल' का है। न मानो तो कुछ भी नहीं। बॉलीवुड स्टार मनोज बाजपेयी अपने ब्लॉगर्स साथियों को ही गोली दे रहे हैं। आपको आश्चर्य होगा उन्हें अपना वायदा याद दिलाने वाला (कड़वा, लगभग 200 शब्दों का) कमेंट भेजने के तीन दिन गुजरने के बाद भी उन्होंने कमेंट को एप्रूव नहीं किया, क्योंकि एपू्रव करते ही पोल खुल जाएगी। ब्लॉगर्स को फिर याद आ जाएगा कि मनोज सिर्फ अपने ब्लॉग की टिप्पणियों को पढ़कर खुश हो जाते हैं, लेकिन पलट कर अपने चाहने वालों के ब्लॉग्स तक नहीं जाते। उन्हें टिप्पणियां नहीं देते!

मनोज बाजपेयी बॉलीवुड के संजीदा अभिनेताओं में से हैं। उनका ब्लॉग भी चर्चा में है, क्योंकि वह इंडस्ट्री के उन लोगों में हैं, जो समय निकाल कर ब्लॉग पर महीने में एक-आध पोस्ट जरूर डालते हैं। लेकिन उनकी पिछली पोस्ट 'सिर्फ लिखता नहीं, ब्लॉग पढ़ता भी हंू' (9 जुलाई 2009) को मनोज ने ही झूठा करार दे दिया है।

क्योंकि मनोज को पसंद करने वाले (जिनमें मैं भी शामिल हंू) उनके ब्लॉग की हर पोस्ट पढऩा पसंद करते हैं। उनकी सफलता की कामना करते हैं। उस पर टिप्पणी देकर संवाद भी कायम करने का प्रयास करते हैं। लेकन मनोज भाई हैं कि पोस्ट के जरिए झूठे बयान जारी कर देते हैं कि वह ब्लॉग पढ़ते भी हैं। मनोज भाई के ब्लॉग पर टिप्पणिकारों की लगातार शिकायतें थी कि आप हमारे ब्लॉग्स तक भी आएं। उन्हें पढ़ें। उन्हें पढ़ कर टिप्पणियां दें। ताकि संवाद इकतरफा न होकर दोनों तरफ से हो। टिप्पणीकारों को लगातार लग रहा था कि वह तो मनोज भाई का ब्लॉग पढ़ते भी हैं, टिप्पणी भी देते हैं, लेकिन मनोज हैं कि टिप्पणियों पढ़ तो लेते हैं, लेकिन पलट कर कभी भी टिप्पणीकारों के ब्लॉग तक नहीं पहुंचते। यह शिकायत मेरी भी थी। इस बारे में मैंने ही नहीं ढेरों ब्लॉगर्स ने मनोज से शिकायत भी की। इसके जवाब में मनोज भाई ने 9 जुलाई 2009 की पोस्ट में खुलकर कहा कि वह दूसरे ब्लॉग्स पढ़ते भी हैं। इसी पोस्ट के लिए मैंने 10 जुलाई को कमेंट भी दिया, जो मनोज ने एप्रूव किया। ...और ऐेसे ही कई पोस्ट उन्होंने एप्रूव की, जिनमें यही शिकायत मनोज से की गई थी। लेकिन इस बार उनके ब्लॉग पर उसी मामले की कड़वी टिप्पणी ब्लॉगर्स न पढ़ लें, इसलिए उन्होंने तीन दिन गुजरने के बाद भी (हर बार अधिकतम एक दिन में एप्रूव कर देते हैं) उसे एप्रूव करना ही मुनासिब नहीं समझा।

यह भी अच्छा खयाल है कि टिप्पणियां पढ़ो और खुश होते रहो। लेकिन उन टिप्पणीकारों की भावनाओं का क्या, जो मनोज से निरंतर जुड़े हुए हैं, लेकिन कह कर भी मनोज उनकी भावनाओं से खेल गए। हालांकि उन्होंने 6 फरवरी 2009 को लिखी अपनी पोस्ट 'कुछ अपनी, कुछ आपकीÓ में उन ब्लॉगर्स (जिनमें मैं भी शामिल था) का जिक्र भी किया, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि मनोज बाजपेयी द्वारा दी गई एक भी टिप्पणी अब तक हमें कहीं नजर ही नहीं आई।

मनोज भाई अगर आप पढ़ते हैं, तो भी आपके जवाब का इंतजार है और नहीं पढ़ते हैं, तो भी आपको इस बात का जवाब देना चाहिए कि आप लोगों के ब्लॉग्स तक पहुंचते। अपना तो देसी हिसाब है आपके चार बार जचे जो टिप्पणी दो, न दो भी किसी का क्या बिगड़ता है। लोगों का जुड़ाव है इसी लिए आपके ब्लॉग पर आते हैं। वर्ना न उन्हें फुर्सत है, न आपको, न मुझे।

मैं तो मनोज भाई आपको सिर्फ वायदा याद दिला रहा हंू। शेष आपकी मर्जी, जो चाहे सो करो...

Friday, July 24, 2009

युवा सीईओ आनंद को सीधी टिप्पणी दें



बी4यू इंडिया डॉट कॉम के सीईओ आनंद माहेश्वरी के चर्चे दुनियाभर में हो रहे हैं। आनंद की वेबहोस्टिंग साइट से जुड़े और उनके संपर्क में आए लोग आनंद के ब्लॉग पर लगातार टिप्पणियां दे रहे हैं।


आनंद को अपनी टिप्पणी सीधे पहुंचाने और उन्हें मिल रहे रेस्पॉन्स को देखने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें-


http://hosting.b4uindia.com/blog/web-hosting/anand-maheshwari-on-rajasthan-patrikas-ravivariya-news-paper/-patrikas-ravivariya-news-paper/

उपरोक्त स्टोरी 'मेरा देश मेरा गांव' में देशभर के ऐसे युवाओं को ही शामिल किया गया है, जिन्होंने ग्रामीण पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते हुए अपने-अपने क्षेत्र में ऐसा काम किया है जो मिसाल देने योग्य है। प्रकाशन के बाद इस स्टोरी का देशभर से बड़े पैमाने पर रेस्पॉन्स मिला है।

आनंद का कवरेज राजस्थान पत्रिका के संपूर्ण भारत संस्करण में प्रसारित रविवारीय परिशिष्ट में हुआ है। पूरी कवरेज को विस्तार से पढऩे के लिए इस तस्वीर पर क्लिक करें।
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Wednesday, July 22, 2009

तकनीक का तेज खिलाड़ी


एलेक्सा रैंकिंग देखेंगे, तो आप चौंक जाएंगे। ग्रामीण पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले जयपुर के युवा सीईओ आनंद माहेश्वरी (26) की वेब होस्टिंग और डेवल्पमेंट साइट बी4यू इंडिया डॉट कॉम (http://www.b4uindia.com/) तेजी से चर्चित हो रही है।


विश्व की 10 करोड़, 98 लाख वेबसाइटों में बी4यू इंडिया डॉट कॉम 45,348 के पायदान पर है। अपनी शुरूआत के चार साल में इस पायदान पर पहुंचना ही खुद ब खुद बी4यू इंडिया डॉट कॉम की सफलता की कहानी बयान कर देता है। 19 अप्रेल, 2005 को करियर के हर विकल्प के आगे हार मान चुके 22 वर्षीय युवा आनंद माहेश्वरी ने एक डोमेन रजिस्टर करवाया। यही डोमेन आज दक्षिण एशिया सहित, अमरीका और यूरोपीय देशों में खासा चर्चित है। व्यापारी वर्ग के लिए येलो पेजेज, युवाओं के लिए 1500 से ज्यादा फ्री गेम्स, शॉपिंग स्टेशन और न्यूज पोर्टल के रूप में स्थापित यह वेबसाइट वेब होस्टिंग के क्षेत्र में देश में दूसरे नंबर पर आ चुकी है। 6 हजार क्लाइंट्स और सालाना 40 लाख के टर्नओवर के साथ बी4यू इंडिया का सफर जारी है। जुनून से बनी अपनी कंपनी की शुरूआत के बारे में बताते हुए आनंद कहते हैं, 'चार साल पहले मैंने 20 हजार रुपए इकट्ठे किए और एक कंप्यूटर खरीद कर काम शुरू किया। अमरीका और यूरोप से वेबसाइट बनाने का फ्रीलांस काम लेना शुरू किया और पहले महीने मात्र 1500 रुपए का फायदा हुआ। मैं जुटा रहा, क्योंकि मेरे पास वापस लौटने का विकल्प नहीं था।' ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद ई-तकनीक में कम उम्र में ही महारत हासिल करने वाले आनंद के पास अब पांच लोगों का स्टाफ है। हर रोज 16 घंटे से ज्यादा अपने काम को देने वाले आनंद की पढ़ाई गांव के स्कूल में ही हुई। स्नातक के बाद आरएएस व आईएएस की तैयारी में जुट गए। दो सालों तक तैयारी के बावजूद भी जब कहीं सलेक्ट नहीं हुए, तो अपने करियर को नई उड़ान देने की कोशिश में जुट गए। आनंद बताते हैं, 'अनाज के कारोबार वाले आड़तिया परिवार से ताल्लुक होने की वजह से मुझे कोई गाइड करने वाला नहीं था। मैंने कंप्यूटर कोर्स इसलिए किया, क्योंकि उस दौर में सब ऐसा कर रहे थे। परीक्षाएं दीं, लेकिन जब चारों तरफ से फेल हो गया, तो मैंने अपने उस हुनर को टटोला जिसमें मेरी दिलचस्पी थी। कई सालों पहले मैं हर रोज 14-15 घंटे नेट खंगालता रहता। बस मैंने अपनी इसी दिलचस्पी को व्यापार का रूप देने की ठान ली।' आनंद अब ग्लोबल प्लेयर बनने की पूरी तैयारी कर चुके हैं। आनंद कहते हैं, 'जब मैंने कंपनी के नाम में इंडिया जोड़ा, सबने कहा था सक्सेस नहीं हो पाओगे और क्योंकि कंपनी के नाम के साथ इंडिया जुड़ा हुआ है। आज अपनी कंपनी के नाम में इंडिया होने की वजह से एक बड़ा वर्ग जो भारत से काम चाहता है, हम पर भरोसा जता रहा है।'

आनंद की इस तेजी से चर्चित हो रही वेबसाइट को देखने के लिए कृपया यहां क्लिक करें-

आनंद का फोन नंबर- 09351159225
(राजस्थान पत्रिका के रविवारीय 19 जुलाई, 2009 में प्रकाशित मेरे आलेख 'मेरा देश मेरा गांव' से...)

Friday, July 17, 2009

स्टाम्प पर फोटोकॉपी का गोरखधंधा उजागर


राजस्थान विश्वविद्यालय में दाखिला लेने के लिए प्रदेशभर से आ रहे विद्यार्थियों को स्टाम्प वेंडर और दलाल किस तरह चुंगल में फंसा रहे हैं, इसी जालसाजी से 16 जुलाई को परदा उठाया। राजस्थान पत्रिका के जयपुर संस्करण में छपी इस खबर के बाद पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू कर दी है।

स्टाम्प से जुड़े इस गोरखधंधे के उजागर होते ही कल जयपुर विकास प्राधिकरण सहित शहर के स्टाम्प वेंडरों में हड़कंप मच गया। पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग के एडीएम ने कार्रवाई करते हुए एक तीन सदयीय सतर्कता दल गठित किया है, जो पूरे मामले की जांच कर अपनी रिपोर्ट विभाग को प्रस्तुत करेगा।

इस खबर को विस्तार से पढऩे के लिए कृपया इन इमेजों पर क्लिक करे...

Thursday, July 2, 2009

मंदी दिमाग में है, बाजार में नहीं!


सही मायने में मंदी, मंदी नहीं मौका है। मौका ज्यादा कमाने का, ज्यादा बनाने का, ज्यादा सहेजने और जुटाने के प्रयास का। ना मानो तो इन पर जरा विचार कर लो...

- प्रॉपर्टी मार्केट ठप्प बताया जा रहा है, लेकिन रीयल बायर्स बेझिझक निवेश कर रहे हैं। अगर आप प्रॉपर्टी के ऐसे पुख्ता खरीदारों की संख्या जुटाएं, तो आज भी आंकड़ा काफी ऊपर है। जो प्रॉपर्टी डीलर मान रहे हैं कि मंदी नहीं है खरीदार तो अब भी मिल रहे हैं, वह जमकर कमा भी रहे हैं।

- सुना है कंपनियां छंटनी कर रही हैं। वह भी छंटनी नहीं है, अवसर है। कंपनी के नजरिए से देखें, वह अपने बेहतरीन और उच्च क्षमता वाले लोगों के साथ काम करने में हमेशा दिलचस्पी लेती है। जो काम करता है और कर सकता है, उसे कोई दिक्कत नहीं। ...आखिर अच्छे लोग कंपनी में होंगे, तो कंपनी को ही फायदा होगा न।

- जितनी कारें, इस कथित मंदी के माहौल में बिकी हैं, पिछले किसी सीजन में नहीं बिकी। किसी कार शोरूम के डीलर से अकेले में बात कीजिए या फिर आंकड़े तलाशिए आप खुद जान जाएंगे।

- 1929 में जब मंदी आई थी, तो नेटवर्क मार्केटिंग का उदय हुआ था। बहुत गहरा विषय है यह। इसने उस मंदी में लोगों कि जितनी मदद की, मिसाल देने जैसा है। आज भी नजर दौड़ाएं, गौर से देखें, नेटवर्क मार्केटर्स बढ़ रहे हैं। कंपनियां बढ़ रही हैं। नेटवर्किंग के बाजार का औसत अनुपात बढ़ ही रहा है। घट नहीं रहा।

- आप और हम नौकरी करते हैं, कम समझ में आएगा। लेकिन एक एंटरप्रेन्योर से पूछिए इस माहौल में कम लागत पर कंपनियां स्थापित करने के ढेरों अवसर मौजूद हैं, बस आपके आइडिए में दम हो।

- अखबारों के क्लासिफाइड्स में लुभावने, दोस्ती बनाने, ज्यादा कमाने जैसे पैसा उलझाने वाले विज्ञापन तेजी से बढ़ रहे हैं। जब लोग पैसा डालेंगे ही नहीं, तो ऐसे विज्ञापन बढ़ेगे ही कैसे?

यह सब मौके हैं, मौका कंपनी के पास, कार या प्रॉपर्टी बेचने वाले के पास, नेटवर्किंग करने वाले के पास, एंटरप्रेन्योर और ढेर सारे ऐसे ही लोगों के पास। दिमाग दौड़ाइए, मंदी को भगाइए। जितनी जल्दी इसे दिल-दिमाग से निकाल देंगे, कम से काम आपकी मंदी जरूर दूर हो जाएगी।

Thursday, June 25, 2009

ब्लॉगर्स शुक्रिया!




9/11 के आतंकवादी हमले की ब्लॉग पर प्रकाशित छह कडिय़ों को लेकर दुनियाभर के ब्लॉगर्स का रेस्पॉन्स मिला। अविश्वसनीय रेस्पॉन्स! उन छह दिनों में 950 से ज्यादा लोगों ने ब्लॉग पर हिट किया और कडिय़ों को पढ़ा। न केवल देशभर से मुझे फोन के जरिए जाने कितने ही ब्लॉगर्स ने संपर्क किया, बल्कि उन्हें पड़ताल का तरीका भी पसंद आया। इसी दौरान मुझे अमरीका और दुबई जैसे देशों से भी फोन आए, ई-मेल आए। मैं नहीं जानता लोगों ने मेरा मोबाइल नंबर कहां से जुटाया। शायद कुछ ब्लॉगर्स को परेशानी भी हुई, जिसके लिए मैं उनसे माफी चाहंूगा।

कुछ ब्लॉगर्स ने सरकारी घोटालों, तो कुछ ने अंतरराष्ट्रीय घोटालों के दस्तावेज गोपनीय रूप से मेल भी किए। कुछेक मित्रों ने अपने निजी मामलों में खोजबीन करने का प्रस्ताव रखा। आप सभी मेरे लिए सम्माननीय हैं, सिर्फ इतना ही निवेदन करूंगा कि जब मौका मिला, समय निकाल पाया सही काम की पड़ताल करने के लिए हमेशा तैयार हंू। आप आधी रात को भी बेझिझक गोपनीय मामलों के संबंध में संपर्क कर सकते हैं।

आप सभी ब्लॉगर्स और भविष्य में जुडऩे वाले ब्लॉगर्स को परेशानी ना हो इसलिए अभी-अभी मैंने अपने ब्लॉग पर गैजेट में मोबाइल नंबर चस्पा कर दिया है। ...खास आपके लिए। ताकि आप परेशान ना हों।

शुक्रिया।

Tuesday, June 16, 2009

मिल मजदूर बना चीन का सबसे धनी व्यापारी


जज्बा और हौसला फर्श से अर्श पर पहुंचा देने की कुव्वत रखता है। मिसाल हैं चीन के ल्यू यॉन्गजिंग, जिन्होंने मिल मजदूर से देश के सबसे धनी शख्स बनने का सफर तय किया। कामयाबी की कहानी खुद उन्हीं की जुबानी-


भले ही मैं आज चीन का सबसे धनी व्यापारी हूँ, लेकिन यह कभी नहीं भूलता कि तीस बरस पहले एक मिल में मजदूर भी था। आज चीन में मेरी 100 फीडस्टफ प्रोसेसिंग फैक्ट्रियां हैं। इनमें पशुओं के लिए चारा, आटा और दूसरे खाद्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं। आज हम चीन में ऐसे प्राइवेट एंटरप्रेन्योर के रूप में स्थापित हो चुके हैं, जो पूरी तरह विज्ञान और तकनीक का उपयोग अपने कारोबार में कर रहे हैं। ऐसे कारोबार में जिससे चीन के लाखों किसान जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि चीन के किसानों के लिए होप कंपनी धनी बनने का सबसे बड़ा माध्यम बनकर उभर रही है। हम डब्ल्यूटीओ में शामिल हो चुके हैं और आप जल्द ही हमें न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में भी पाएंगे।


दक्षिण-पश्चिम चीन के साईशुएन के एक बेहद गरीब परिवार में मेरा जन्म हुआ। बाकी सुविधाओं की बात तो दूर दो वक्त की रोटी जुटाना भी हमारे लिए चुनौतीपूर्ण था। परिस्थितियां बिलकुल भी अनुकूल नहीं थी। ...और मैं पचास डॉलर प्रति सप्ताह मजदूरी मिलने वाले देश में मजदूर के तौर पर संघर्ष कर रहा था। मैं और मेरे तीन भाई वर्षों तक मजदूरी करते रहे और परिवार चलाते रहे। मेरी जड़ें गांव से जुड़ी थीं, इसलिए मैं ऐसे ही किसी कारोबार को शुरू करने की योजना बनाता, जो सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा हो। अपने हालात और माहौल के मुताबिक मैंने तीतर और चूजों का कारोबार करने की जब ठानी, तो जेब में एक पैसा नहीं था। तीतर खरीदने के लिए मैंने अपनी घड़ी और साइकिल भी बेच दी। इनसे मिले पैसों से अपने तीनों भाइयों के साथ कारोबार शुरू करने का फैसला किया। इस कारोबार की शुरुआत हमने 1982 में की। हम तीतर और चूजे लाते, उन्हें पालते और बेच देते थे। हालांकि शुरू-शुरू में तो तीतर और चूजों के कारोबार में हमेंं ज्यादा मुनाफा नहीं हुआ। हम चूजों के भोजन और दवाओं का बंदोबस्त भी कई बार मुश्किल से ही कर पाते थे। लेकिन जैसे-जैसे कारोबार का विस्तार चीन के किसानों तक हुआ, हम आगे बढ़ते गए। 1995 आते-आते कंपनी 300 मिलियन युआन (चीनी मुद्रा) की बन गई। यह कारोबार ज्यादा लंबा नहीं चला। इसी दौरान मेरे भाई मुझसे अलग हो गए, लेकिन मैं बिना रुके आगे बढ़ता चला गया। इसी साल मैंने होप ओरियंटल कॉर्पोरेशन की स्थापना की।

वर्ष 2001 में मुझे फोर्ब्स की ओर से अपने आठ बिलियन डॉलर के कारोबार के चलते टॉप एंटरप्रेन्योर का दर्जा दिया गया। 2005 में चीन के 400 धन कुबेरों की सूची में मैं पांचवें स्थान पर आ गया। इसी साल सोहू कोमस की ओर से 'टॉप 10 फाइनेंशियल पीपल ऑफ 2001Ó में शामिल किया गया। एशिया वीक मैगजीन की ओर से 'मोस्ट इंफ्लुएंटल एंटरप्रेंयोर्स इन चाइना इन द ट्वंटी फर्स्ट सेंचुरी'का सम्मान मुझे दिया गया और फोर्ब्स मैगजीन की ओर से 2008 के सबसे धनी चीनी व्यापारी के तौर पर नवाजा गया। जो भी हुआ वह कोई चमत्कार नहीं था, बल्कि हमारी जी तोड़ मेहनत और संभावनाओं के परिणामस्वरुप ऐसा हुआ। इस कारोबार में संभावनाएं तो थीं ही लेकिन इस कामयाबी के पीछे मेरा जबरदस्त संघर्ष और उच्च महत्त्वाकांक्षा थी।

(14 जून, 2009 को रविवारीय के मेरा संघर्ष कॉलम में प्रकाशित)

Sunday, June 14, 2009

क्या एफबीआई की सूची झूठी थी? : 9/11 अमरीकी हमला : अंतिम कड़ी


आप भरोसा करेंगे और खंगालेंगे, तो सतब्ध रह जाएंगे।


...लेकिन यह सच है। 11 सितंबर को हमला होने के ठीक 3 दिन बाद (14 सितंबर, 2001 को) अमरीका की जानी-मानी खूफिया जांच एजेंसी एफबीआई ने 19 अरब आतंकियों की सूची जारी की। हादसे के ठीक 12 दिन बाद विश्व की प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी बीबीसी की पड़ताल के बाद जारी खबर ने एफबीआई की ओर से जारी आतंकवादियों की सूची पर सवालिया निशान लगा दिया।

बीबीसी की खबर के मुताबिक वल्र्ड ट्रेड सेंटर से टकराने वाले विमान 11 में जिन पांच आतंकवादियों के होने की पुष्टि एफबीआई ने की थी, उन्हीं पांच में से वलिद एम. अलशिहरी एक थे। अलशिहरी ने इस घटना के एक साल पहले सितंबर, 2000 में अमरीका छोड़ा था, क्योंकि सऊदी अरब एयरलाइंस में उन्हें पायलट बनने का अवसर मिल गया था और घटना घटित हुई उस वक्त वे मोरक्को में ट्रेनिंग कोर्स कर रहे थे। गौर करने वाली बात यह है कि अगर वे आतंकवादी थे और हादसे में उनकी मौत हो चुकी थी, तो अचानक जिंदा कैसे हो गए?

ठीक इसी तरह विमान 11 के एक और संदिग्ध (एफबीआई के मुताबिक) अब्दुल अजीज अल ओमारी के जिंदा होने की भी बीबीसी ने पुष्टि कर दी। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक वे सऊदी टेलीकॉम के इंजीनियर के रूप में हादसे के बाद भी अपनी नौकरी करते पाए गए। वह जिंदा कैसे हो गए?

विमान 93 की सूची में एफबीआई की ओर से जारी अंतिम नाम सईद का था। लंदन के एक अरबी अखबार ने उसी सईद का इंटरव्यू प्रकाशित कर उनके जिंदा होने पर मुहर लगा दी थी। जिसका खुलासा बीबीसी ने किया।

एफबीआई की ओर से विमान 77 के घोषित आतंकवादी खालिद अल मिदहर के जिंदा होने की पुष्टि भी बीबीसी ने इसी दिन कर दी थी।

इस पूरे मामले की जांच के लिए एफबीआई के 4000 एजेंट नियुक्त थे। वह भी 3000 स्पोर्ट स्टाफ के साथ और जांच में जुटे 400 अन्य लोग प्रयोगशाला से ताल्लुक रखने वाले थे। बावजूद इसके एफबीआई जैसी प्रतिष्ठित खूफिया जांच एजेंसी ने यह 19 लोगों की सूचि किस बिनाह पर जारी की? 'क्या एफबीआई की सूची झूठी थी?'

प्रतिष्ठित न्यूज सर्विस बीबीसी की जिस खबर का हवाला मैंने दिया है, उसे पढऩे के लिए कृपया यहां क्लिक करें - बीबीसी डॉट कॉम

सवाल बरकरार है। ऐसे ही ढेरों सवाल अभी बाकी। मुद्दा आप तक पहुंच चुका है। इसे खंगालें, जांचे, टटोले और मेरी निजी राय है तथ्यों और सबूतों पर ही भरोसा करें।

मिलते रहेंगे, एक नई खोज के साथ। एक नए मुद्दे के साथ।

इन सवालों का संबंध 9/11 हमले से है! : 9/11 अमरीकी हमला : कड़ी - 5


अमरीकी हादसे को हुए आठ साल होने को हैं, लेकिन उस दर्दनाक हादसे में 3000 जानें गई। उनका दर्द आज भी कई सवालों को तलाश रहा है।

* एफबीआई, सीआईए और दूसरी अमरीकी इंटीलीजेंस एजेंसियों को सालाना 30 बिलियन डॉलर से ज्यादा की धनराशि खर्च के लिए दी जाती है। इतना मोटा खर्च होने के बावजूद इन एजेंसियों को इस षडय़ंत्र की जानकारी क्यों नहीं थी? इतनी बड़ी नाकामी के बावजूद आखिर इन एजेंसियों को क्यों दुबारा इतना ही धन खर्च के लिए दिया गया?

* फ्लाइट 77 का अपहरण सुबह 9 बजे किया गया था। इसी समय वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हो चुका था। क्या फ्लाइट कंट्रोलर्स इस बात से वाकिफ थे और उन्हें इसके परिणाम पता थे? यह विमान 40 मिनट तक हवा में रहा, इस दौरान वायु सेना ने इस विमान को क्यों नहीं रोका? जबकि सात स्थानों पर अमरीकी वायु सेना के लड़ाकू विमान हर समय सुरक्षा के लिहाज से तैयार रहते हैं और 10 मिनट के नोटिस पर वह उड़ान भर लेते हैं?

* एफएफए, एफबीआई, सीआईए और एनएसए ने क्यों विमान से मिलने वाले सिग्नल्स और संचार संबंधी कोई जानकारी जारी नहीं की?

* अपहरणकर्ता, पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स के बीच हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग अब तक जारी नहीं की गई? वह कहां है?
* एक आग बुझाने वाले चशमदीद गवाह ने नॉर्थ टावर से टकराने वाले विमान के पंखों के कोई इंजन लगा हुआ नहीं देखा। क्या वह बोइंग 757 नहीं था? क्या इस विमान के टकराने से पहले मिसाइल भी टावर से टकराई थी?

* जब नॉर्थ टावर पर कोई पब्लिक टीवी कैमरा नहीं लगाया गया था, तो फ्लोरिडा के एक क्लासरूम में जाने से पहले जॉर्ज बुश ने किस स्रोत से हमला होते देखा? जानकारी के बावजूद उन्होंने कुछ किया क्यों नहीं, जबकि इसके आधा घंटे बाद दूसरे टावर पर भी हमला हो गया? क्या बुश को इन हमलों के बारे में पहले से सब कुछ पता था?

* चारों विमानों में मरने वाले यात्रियों की सूची में 19 अरबी अपहरणकर्ताओं के नाम क्यों नहीं थे? जबकि एफबीआई ने कैसे पहले से ही सूची तैयार कर रखी थी और कैसे यह बात कही कि सभी 19 लोग अरबी थे

* वल्र्ड ट्रेड सेंटर के मलबे का फॉरेंसिक परीक्षण क्यों नहीं करवाया गया? क्यों लगभग पूरा मलबा देश से बाहर भेज दिया गया?

कल की अंतिम कड़ी आपको सतब्ध कर देगी 'क्या एफबीआई की सूची झूठी थी?' पढऩा न भूलें!

Saturday, June 13, 2009

घपलों की फाइलें दफन : 9/11 अमरीकी हमला : कड़ी - 4

सुबह 9 बजकर 59 मिनट पर वल्र्ड ट्रेड सेंटर का साउथ टावर लगभग दस सैकंड में जमींदोज हो गया। इसके ठीक 29 मिनट बाद नॉर्थ टावर भी 10 सैकंड में ढेर हो गया। इसी शाम 5 बजकर 20 मिनट पर वल्र्ड ट्रेड सेंटर का 47 मंजिला टावर-7 अचानक गिर गया। यह ट्विन टावर्स से 300 गज की दूरी पर था। इसमें सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (सीआईए), डिफेंस डिपार्टमेंट, इंटरनल रेवेन्यू सर्विस (आईआरएस) और सीक्रेट सर्विस के अहम दफ्तर और मेयर रूबी जुलियानी का इमरजेंसी बंकर था। इसी टावर में वॉल स्ट्रीट में हुए घपलों की तीन-चार हजार फाइलें मौजूद थीं। अमरीकन सरकार द्वारा जारी बयान के मुताबिक ट्विन टावर्स से गिरने वाले मलबे की वजह से टावर-7 में कई डीजल की टंकियों में आग लग गई। यानी छह सैकंड में ढेर होने वाले इस तीसरे टावर के गिरने की वजह आग थी। वैज्ञानिक आधार पर देखा जाए तो इन तीनों टावर के गिरने की गति समान थी।


...और पासपोर्ट सलामत?
ट्विन टावर्स और पेंटागन पर हमले की जांच कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक अमरीकन एयरलाइंस और यूनाइटेड 175 के दोनों कॉकपिट और डेटा रिकॉर्डर नहीं मिले। लेकिन एफबीआई का दावा था कि उन्हें अपहरणकर्ताओं में से एक स्टाम अल सुकामी का पासपोर्ट मैनहटन की सड़क पर पड़ा मिला, जो धमाके के साथ ही उनकी जेब से निकल कर सड़क पर गिर गया था। यह गौर करने वाली बात है कि विमान का मजबूत और नष्ट न होने वाला ब्लैक बॉक्स तो धमाके में नष्ट हो गया, लेकिन कागज से बना पासपोर्ट फिर भी सही सलामत रहा!


यह भी कटु सच्चाई है कि अप्रेल 2002 में एफबीआई ने स्वीकार किया कि उनके पास कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि उन अपहरणकर्ताओं ने ही इस घटना को अंजाम दिया था। 19 अप्रेल, 2002 को सेन फ्रांसिस्को के कॉमल वेल्थ क्लब मे एफबीआई के निदेशक रॉबर्ट म्यूलेट ने स्वीकार किया कि हम अपनी पड़ताल में अपहरण संबंधी कागज का एक टुकड़ा भी हासिल नहीं कर पाए।


(अगली कड़ी में कल पढ़ें 'इन सवालों का संबंध 9/11 हमले से है!')

Friday, June 12, 2009

वास्तव में हुआ क्या था? : 9/11 अमरीकी हमला : कड़ी - 3

यह सवाल आज भी करोड़ो लोगों को कोंध रहा है कि आखिर उस दिन की वास्तविक घटना क्या है? 9/11 की इस घटना के एक महीने बाद अक्टूबर में एक वेबसाइट पर दो लेख प्रकाशित हुए जिनमें पहली बार अमरीकी सरकार के आधिकारिक बयान को नकारा गया। इस वेब पर पहला लेख केरोल वेलेंटाइन का 'ऑपरेशन 9/11 नो सुसाइड पायलट्स' था। इस लेख ने लोगों का ध्यान इस संभावना की ओर खींचा कि संभवतया ट्विन टावर्स और पेंटागन से टकराने वाले यात्री विमान नहीं खुद अमरीका द्वारा रिमोट कंट्रोल से संचालित बिना यात्री-पायलट विमान थे। दरअसल यह ज्यादा अविश्वसनीय लगता है कि चार जेट विमानों को लगभग एक ही समय में अगवा कर लिया जाए और वो भी विदेशी 19 अरब आतंकवादियों के द्वारा!

दूसरा आलेख जॉय वियला का था। उन्होंने अपने आलेख 'होमरन: इलेक्ट्रोनिकली हाइजेकिंग द वल्र्ड ट्रेड सेंटर अटैक एयर क्राफ्ट' में रिमोट कंट्रोल के जरिए बोइंग एयर क्राफ्ट की उड़ान का जिक्र किया। फिर फरवरी 2002 में एक फ्रेंच वेबसाइट सुर्खियों में आई जिसमें दावा किया गया कि पेंटागन से टकराने वाला यात्री विमान था ही नहीं। इनके फोटो देखने से साफ स्पष्ट होता है कि पेंटागन से टकराने वाला बोइंग 757 नहीं था। मार्च 2004 में लियोनार्ड स्पेंसर का 'द अटैक ऑन द पेंटागन' शीर्षक से एक आलेख प्रकाशित हुआ, जिसमें प्रत्यक्षदर्शियों, एयर ट्रेफिक कंट्रोल रिपोर्ट और फोटोग्राफ के जरिए इसका खुलासा किया।

आधिकारिक बयान को नकारने और इसे अमरीकी षडय़ंत्र बताने वालों का कहना है कि उस दिन की वास्तविक घटना क्या है यह तो वही जानते हैं, जिन्होंने इसको अंजाम दिया, लेकिन जिस तरह के सबूत सामने आए हैं, वे एक अलग ही घटना बयान करते हैं। यह घटना उस घटना से अलग है, जो अमरीकी प्रशासन ने दुनिया को दिखाई। इस दूसरी तस्वीर के आधार हैं वे पुख्ता प्रमाण जो फोटोग्राफ इत्यादि के रूप में मौजूद हैं।
मार्च 2002 में केरोल वेलेंटाइन ने इस घटना के बारे में लिखा, 'यह साजिश अरब आतंकवादियों द्वारा नहीं बल्कि खुद अमरीका द्वारा रची गई। इस षडय़ंत्र में अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए, अमरीका के उच्च वायु सैन्य और प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे। संभवतया इसमें इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद की भी मदद ली गई थी। अमरीका इस साजिश का आरोप अरब आतंकवादियों पर लगाकर मध्य-पूर्व और एशिया के अमरीकी दुश्मन देशों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू करना चाहता है। इस सब कार्रवाई के पीछे अमरीका का असली मकसद तेल और खनिज संसाधनों पर अपना नियंत्रण बनाना है। यह साजिश सिर्फ एक दिन में नहीं रची गई, बल्कि इसकी तैयारी में बरसों लगे हैं।'

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा, लेकिन 9/11 की घटना का ताल्लुक अमरीकी सेना के कुछ महत्त्वपूर्ण अभियानों से रहा है। घटना के पहले 40 सालों की चंद अमरीकन सैन्य गधिविधियों को खंगालने पर पूरी तस्वीर साफ हो गई। इन गतिविधियों के सबूत के तौर पर अमरीकी सरकार के 'अति गोपनीय दस्तावेज (टॉप सीक्रेट डॉक्यूमेंट) मुझे मिले, जिनसे इन घटनाओं का खुलासा हो रहा था।

13 मार्च, 1962

अमरीकी फौज के कमांडर लैमिन लेमिंट्जर ने अमरीकी सैन्य सचिव रॉबर्ट मैक मारा को 'ऑपरेशन नॉर्थवुड' पेश किया। इसके मुताबिक कॉन्टोनामो खाड़ी के अंदर व बाहर दहशतगर्दाना हमले करवाकर क्यूबा को जिम्मेदार ठहराना व क्यूबा पर फौजी चढ़ाई की जानी थी। क्यूबा के खिलाफ जासूसी रेडियो के इस्तेमाल की अफ्वाह फैलाना। क्यूबन दोस्तों के द्वारा बेस पर हमले का ड्रामा करवाना। मुख्य दरवाजे पर हंगामा शुरू करवाना। बेस पर मौजूद हवाई और पानी के जहाजों को साबूदाज करना। बेस पर बमबारी करना। बेस के बाहर पानी का नकली जहाज डुबोना। बेस में गोला बारूद फोडऩा ताकि आग लग जाए। नकली जनाजे दफन करने का ड्रामा करना। मयामी, फ्लोरिडा और वॉशिंग्टन डीसी में आतंक फैलाना और आखिर में अपने ही बिना पायलट के हवाई जहाज को क्यूबा की सरहद में मार गिराना। 'ऑपरेशन नॉर्थवुड' प्लान के मुताबिक इस जहाज के मुसाफिर एफबीआई एजेंट होंगे, लेकिन कहा जाएगा कि वह विद्यार्थी हैं। एग्लिन एयरपोर्ट बेस पर सीआईएस के एक हवाई जहाज को मुसाफिरों के जहाज का रंग लगाकर नकली सिविलियन जहाज बनाना। उस नकली जहाज को असली से बदलकर उस पर मुसाफिर सवार करना। असली जहाज को बिना पायलट का जहाज बना देना। ये दोनों जहाज फ्लोरिडा के दक्षिण में जाएंगे। नकली जहाज एग्लिन एयरफोर्स बेस पर यात्रियों को उतार कर अपने असली मिशन पर लौट जाएगा। असली जहाज बिना पायलट के क्यूबा की ओर रवाना हो जाएगा। क्यूबा के समुद्री इलाके में दाखिल होने के बाद सिग्नल मिलते ही उसे रिमोट कंट्रोल के जरिए उड़ा दिया जाएगा। इस प्लान को रॉबर्ट मैक नमारा खारिज कर देते हैं और कुछ महीनों के बाद जॉन एफ कैनेड़ी लेमिंट्जर को फौज के कमांडर के पद से हटा देते हैं। (स्रोत : टॉप सीक्रेट डॉक्यूमेंट)


ऑपरेशन नॉर्थवुड से जुड़ा 13 मार्च, 1962 को जारी अमरीका के सैन्य सचिव को जारी अति गोपनीय दस्तावेज इंटरनेट पर भी मौजूद है। इस लिंक पर क्लिक करके आप भी 12 पृष्ठ के इस अति गोपनीय दस्तावेज को खंगाल सकते हैं। इसके लिए कृपया यहां क्लिक करे-



(अगली कड़ी में कल पढ़ें 'घपलों की फाइलें दफन')

Thursday, June 11, 2009

आखिर क्या है पेंटागन का सच! : 9/11 अमरीकी हमला : कड़ी 2

अमरीकी सरकार के आधिकारिक बयान को नकारने वाले और इसे अमरीकी सरकार का षडय़ंत्र बताने वालों ने पेंटागन हमले की भी कई खामियां पेश की हैं। सुबह 9 बजकर 38 मिनट पर आलिंग्टन वर्जिनिया, 530 मील प्रति घंटे की रफ्तार से विमान 330 डिग्री का टर्न लेता है। ढाई मिनट में सात हजार फीट नीचे उतरते हुए अमरीकन एयरलाइंस की फ्लाइट 77 पेंटागन से जा टकराती है। हादसे के बाद घटनास्थल पर फ्लाइट 77 का कोई नामोनिशान नहीं और न ही कोई सबूत। विमान के क्षतिग्रस्त हिस्से और उसके इंजन के कोई बड़े हिस्से वहां नहीं मिले, जो यह साबित करते हों कि फ्लाइट 77 पेंटागन से टकराई थी। इस हादसे के बाद अमरीकन सरकार का बयान था कि जलते हुए जेट के इंधन की गर्मी से पूरा जहाज जलकर खाक हो गया। सवाल खड़ा होता है जब आग में इतनी गर्मी थी कि जंबो जेट को ही निगल गई, तो फौज की डीएनए टेस्ट करने वाली लैबोरेट्री ने उसी विमान में सवार 189 में से 184 लोगों की पुष्टि कैसे की?


तकनीकी रूप से देखें, तो एक बोइंग 757 के दो इंजन होते हैं, जो स्टील और टाइटेनियम एलॉय से बनाए जाते हैं, जिसकी गोलाई नौ फीट, लंबाई 12 फीट और वजन 6 टन होता है। टाइटेनियम 1688 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर जाकर पिघलता है। जेट इंधन हाइड्रोकार्बन है, जो 40 मिनट जलने के बाद 1120 डिग्री तक पहुंचता है, वह भी तब जबकि उसे लगातार ईंधन मिलता रहे। ईंधन को धमाके के बाद तुरंत जल जाना चाहिए था। विज्ञान के हिसाब से यह नामुमकिन है कि बारह टन का स्टील और टाइटेनियम जेट रिन्धन से जलकर राख हो जाए? यानी दोनों इंजन पेंटागन में मिलने चाहिए थे। लेकिन उसकी जगह तीन फीट की गोलाई वाला सिर्फ एक टर्बोजेट इंजन का टुकड़ा पेंटागन में मिला। जो टुकड़े मिले उनसे कहीं भी पुष्टि नहीं हुई कि वे टुकड़े उसी जहाज के थे, जिसकी पुष्टि सरकार ने की थी।


शोधकर्ताओं के मुताबिक नौ फीट स्टील और कंक्रीट की मजबूत दीवार को पार करते हुए, 16 फीट सुराख सिर्फ एक क्रूज मिसाइल ही कर सकती है। पेंटागन के करीब शेरेटन होटल और वर्जिनिया के ट्रांस्पोर्ट डिपार्टमेंट के कैमरों में यह सब कैद हुआ था, लेकिन एफबीआई ने कुछ ही देर में इनकी वीडियो को अपने कब्जे में ले लिया। 11 सितंबर के ठीक चार दिन पहले सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों में पेंटागन के नजदीक जमीन पर ठीक उसी जगह एक सफेद निशान दिखाई दिया, जहां यह विमान टकराया।


(आप खुद इस विषय पर पढ़ सकें, ज्यादा जान सकें इस लिए विषय संबंधी सभी तरह के सोर्स के लिए गूगल सर्च इंजन में लिखें What Actually Happened on 9/11?, इन्हीं सोर्स और सीड़ी को आधार बनाकर इस शृंखला को जारी किया गया है)


(अगली कड़ी में कल पढ़ें 'वास्तव में हुआ क्या था?')

Wednesday, June 10, 2009

9/11 हमला किसने करवाया? एक्सक्लूसिव खुलासा?


'11 सितंबर 2001 को अलकायदा से जुडे 19 आतंकवादियों ने चार विमानों (बोइंग 757 और 767) का अपहरण कर इनमें से तीन को सार्वजनिक इमारतों से भिड़ा दिया। न्यूयॉर्क स्थित वल्र्ड ट्रेड सेंटर के दो टावर और वॉशिंगटन के नजदीक स्थित पेंटागन को निशाना बनाया गया। वल्र्ड ट्रेड सेंटर के दो टावर नष्ट हो गए ओर पेंटागन क्षतिग्रस्त हो गया। चौथा विमान किसी इमारत को निशाना नहीं बना पाया और यह पेनिस्लेविया में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इनमें सवार सभी यात्री मारे गए। इस सामूहिक हमले में तीन हजार से ज्यादा लोग मारे गए।' (9/11 हमले के बाद अमरीकी सरकार द्वारा जारी आधिकारिक बयान)



हादसे के पहले की अहम घटनाएं
24 जुलाई 2001 : लैरी सिल्वरस्टीन ने पूरे वल्र्ड ट्रेड सेंटर को 3.2 बिलियन डॉलर में 99 साल की लीज पर लिया। यानी 11 सितम्बर के छह हफ्ते पहले। इस लीज में 3.5 बिलयन डॉलर की बीमा पॉलिसी भी शामिल थी, जो खास तौर पर आतंकवादी हमलों को भी कवर करती थी।
6 सितम्बर 2001 : यूनाइटेड एयरलाइंस के स्टॉक पर 3150 पुट ऑप्शन रखे गए। पुट ऑप्शन तब रखा जाता है, जब स्टॉक के दाम गिरने की आशंका हो। रोजाना के मुकाबले उस रोज चार गुना पुट ऑप्शन रखे गए। इसी दिन बम सूंघने वाले कुत्तों को वल्र्ड ट्रेड सेंटर से हटा लिया गया और सुरक्षा गाड्र्स की दो हफ्ते से चल रही बारह घंटे की शिफ्ट को भी खत्म कर दिया गया।
7 सितम्बर 2001 : बोइंग के स्टॉक पर 27,294 पुट ऑप्शन रखे गए, जो आम दिनों से 5 गुना ज्यादा थे।
10 सितंबर 2001 : अमरीकन एयरलाइंस के स्टॉक पर 4,516 पुट ऑप्शन रखे गए, जो आम दिनों की तुलना में 11 गुना अधिक थे। न्यूजवीक की रिपोर्ट के मुताबिक पेंटागन के कई बड़े ओहदेदारों ने अगली सुबह का अपना हवाई सफर रद्द किया। सैन फ्रांसिस्को के मेयर विली ब्राउन को फोन के जरिए अगली सुबह जहाज में सफर न करने की हिदायत दी गई। यह फोन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कोंडोलिजा राइस का था।



ट्विन टावर्स : इतना स्टील पिघल गया?
ट्विन टावर्स का इतिहास कुरेदा, तो पता चला कि सन् 1970 में 1368 फीट ऊंचे नॉर्थ टावर और 1973 में 1362 फीट ऊंचे साउथ टावर को बनाने में दो लाख टन स्टील और 4।25 लाख घन यार्ड सीमेंट का इस्तेमाल किया गया था। 9/11 हादसे के बाद अमरीकी सरकार की ओर से जारी बयान में यह कहा गया था कि 'विमान टक्कर के बाद लगी आग से टावर्स में लगा स्टील का मजबूत ढांचा गल गया और टावर जमींदोज हो गए।'


न्यू मैक्सिको इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एंड टेक्नोलॉजी के वाइस प्रेसिडेंट वैन रोमेरो ने टावर्स गिरने के बाद अपना बयान जारी किया। इसमें उन्होंने कहा, 'टावर के अंदर पहले से रखे बमों के फटने से टावर नीचे आया। यह मुमकिन ही नहीं कि विमान के टकराने और इसमें लगी आग से टावर नीचे आए।' लेकिन आश्चर्यजनक रूप से दस दिन बाद उन्होंने अपना यह बयान बदल दिया और कहा 'टावर आग लगने की वजह से नीचे गिरे थे।' इस बीच वल्र्ड ट्रेड सेंटर के कंस्ट्रक्शन मैनेजर हाइमर ब्राउन ने इसी दौरान एक बयान जारी किया। उनके मुताबिक, 'टावर्स की मजबूती ऐसी थी कि वह हर तरह के हादसे को बर्दाश्त कर सके। जैसे की तूफान, बम धमाके, विमान का टकराना भी, लेकिन 2000 डिग्री फारेनहाइट पर जल रहे ईंधन ने बिल्डिंग में लगे स्टील को कमजोर कर दिया।' जबकि वल्र्ड ट्रेड सेंटर में इस्तेमाल किए गए स्टील की जांच करने वाली कंपनी अंडरराइटर्स लेबोरेट्रीज के केविन रायन ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्टैंडर्ड एंड टेक्नोलॉजी के फ्रेंक केल को एक पत्र में लिखा, 'हम सभी जानते हैं कि वल्र्ड ट्रेड सेंटर में 'एएसटीएम ई119 प्रमाणित' स्टील का इस्तेमाल हुआ था। इस किस्म के स्टील को टेस्ट करते वक्त उसे कई घंटों तक 2000 डिग्री फारेनहाइट पर गर्म किया जाता है। इसके अलावा चालू किस्म का स्टील भी 3000 डिग्री फारेनहाइट पर जाकर ही पिघलता है, तो हाइमर ब्राउन ने यह नतीजा कैसे निकाल लिया कि इमारत में इस्तेमाल होने वाला बेहतरीन स्टील दो हजार डिग्री फारेनहाइट पर पिघल गया। यह बात बिलकुल बेबुनियाद है।' इस पत्र को लिखने के कुछ ही दिनों बाद केविन रायन को उनके पद से हटा दिया गया।



टावर के अंदर हुए विस्फोट
अमरीकी सरकार पर उंगली उठाने वालों का दावा है कि ट्विन टावर्स के अंदर साजिश के तहत पहले से भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री रखी गई थी और उस विस्फोटक सामग्री से ही ये टावर्स ध्वस्त हुए। यह नामुमकिन है कि विमान टकराने से ये टावर्स इतने ध्वस्त हो जाएं। जैसा कि दूसरा विमान सुबह नौ बजकर तीन मिनट पर साउथ टावर की 78 वीं मंजिल और साउथ ईस्ट कोने से टकराया। आधे से ज्यादा ईंधन आग के गोले की शक्ल में फटा। यह टावर नॉर्थ टावर से पहले नीचे आया जबकि नॉर्थ टावर से विमान सीधे जाकर टकराया और वह इसके 18 मिनट पहले से जल रहा था। न्यूटन के गति नियम के मुताबिक किसी भी चीज के सीधे नीचे गिरने का हिसाब लगाया जाए, तो इस टावर को गिरने में 9.2 सैकंड का समय लगना चाहिए और इस साउथ टावर को गिरने में इतना ही वक्त लगा। मतलब साफ है जिन प्रत्यक्षदर्शियों ने टावर की 10-15 मंजिलों के बीच 6 धमाके देखे थे, वे सही थे। यानी इमारत गिराने के लिए उसके भीतर से विस्फोट किए गए थे और आंतरिक विस्फोटों से ही यह टावर धराशायी हुआ। साउथ टावर के नजदीक चर्च स्ट्रीट पर इस हादसे के एक चश्मदीद गवाह ने इमारत की 10वीं और 15वीं मंजिल के बीच चिंगारी निकलते देखी थी और टावर गिरने के पहले अंदर 6 बार रोशनी देखी गई।


(अगली कड़ी में कल पढ़ें 'आखिर क्या है पेंटागन का सच!')

Friday, May 15, 2009

...दोस्त तुमने आने में देर कर दी

डूबते हुए आदमी ने
पुल पर चलते हुए आदमी को
आवाज लगाई 'बचाओ बचाओ'
पुल पर चलते आदमी ने नीचे
रस्सी फेंकी और कहा आओ...

नदी में डूबता हुआ आदमी
रस्सी नहीं पकड़ पा रहा था
रह-रह कर चिल्ला रहा था
मैं मरना नहीं चाहता
जिंदगी बड़ी महंगी है
कल ही तो मेरी एक एमएनसी में नौकरी लगी है

इतना सुनते ही पुल पर चलते
आदमी ने अपनी रस्सी खींच ली
और भागते-भागते वो एमएनसी गया
उसने वहां के एच.आर. को बताया कि
अभी-अभी एक आदमी डूबकर मर गया है
और इस तरह आपकी कंपनी में
एक जगह खाली कर गया है...

मैं बेरोजगार हंू मुझे ले लो...
एच.आर. वाले बोले दोस्त तुमने आने में देर कर दी,
अब से कुछ देर पहले हमने उस आदमी को लगाया है
जो उसे धक्का देकर तुमसे पहले यहां आया है!!!

Monday, May 11, 2009

अमरीकी प्रिंट मीडिया 'डार्क वीक' की चपेट में!


पिछले कुछ सप्ताह अमरीकी प्रेस के लिए डार्क वीक (काले सप्ताह) बन गए हैं। खासतौर पर प्रिंट मीडिया मंदी के साये में है। चाहे-अनचाहे समाचार पत्र बंद हो रहे हैं। मीडिया के बड़े समूह अपने 2,00,000 से ज्यादा वितरण वाले समाचार पत्रों को ताले जडऩे की स्थिति में आ गए हैं। यहां प्रिंट मीडिया में हालात कुछ इस तरह के हो गए हैं कि समाचार पत्र प्रबंधकों के पास अपने प्रोजेक्ट समेटने के सिवा कोई विकल्प मौजूद नहीं है। हर सप्ताह लाखों डॉलर का नुकसान इस कागजी दुनिया पर मंदी की असल मार के वक्त का तकाजा बुन रहा है। इनमें से कई समाचार पत्रों के हालात यहां तक आ गए हैं कि जिंदा रहने के लिए वे सिर्फ अपने ऑनलाइन संस्करण ही निकालने को मजबूर हैं।


टाइम मैग्जीन की वेबसाइट को खंगालते वक्त इस खबर पर मेरी नजर पड़ी। इसे विस्तार से पढऩे के लिए यहां क्लिक करें...

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